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29
Dec

अमरोहा में हज़रत विलायत शाह की दरगाह

भारत एक ऐसा देश है जहां मंदिरों, दरगाहो और दुर्ग किलाओ के कई अजीबो गरीब किस्से आपने सुने होंगे या देखे भी होंगे। क्या कभी  आपने ऐसी कोई जगह देखी है जहां हज़ारों की तादात में बिच्छु हो और वो काटे भी नही ! जी हाँ आप बिलकुल ठीक सुन रहे है उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हज़रत विलायत शाह की दरगाह का निज़ाम कुछ ऐसा ही है कहते है यहाँ के बिच्छू दरगाह परिसर में इन्शानो को तो क्या किसी दूसरे जीवजंतु तक को भी  नही काटते लेकिन इसी बिच्छू को अगर आप भूल से दरगाह से दूर इसकी सीमा से बहार ले जाये तो यह आपको तुरन्त काट लेगा।

बिच्छू जैसे खतरनाक जंतु के इस तरह के व्यवहार की कल्पना करना बेमानी है परन्तु जब आप स्वयं के साथ ऐसा हो तो फिर आप क्या कहेंगे। देश की   ऐतिहासिक और चमत्कारिक दरगाहो में शुमार हज़रत शाह विलायत की दरगाह का सच जानने के लिए हम आपको इतिहास के उन पन्नो तक ले चलते है जिन्हें आज 800 साल पहले लिखा गया

नोवीं सदी के मध्य ईरान से एक सूफियाना अंदाज़ वाले सख्स जिनका नाम सैयद सरबुद्दीन शाह विलायत था वो भारत की यात्रा पर आये। इस दौरान वो उत्तर प्रदेश के अमरोहा पहुंचे जहां पहले से एक बाबा शाह नसीरुद्दीन कयाम कर रहे थे बताया जाता है कि शाह नसीरुद्दीन इस्लाम के मानने वालो में काफी चर्चित और मान्यता वाले फ़क़ीर थे। इतिहास के पन्नो से पता चलता है कि जब अमरोहा की जमीन पर ईरान के सूफी संत सैयद सरबुद्दीन शाह विलायत के कदम पड़े तो बाबा शाह नसीरुद्दीन काफी खफा हो गए और सैयद सरबुद्दीन को वापस जाने का हुकम दे दिया परन्तु सैयद सरबुद्दीन को अमरोहा की आबोहवा इस कदर भा गयी की उन्होंने वापस जाने के मानस को हमेशा हमेशा के लिए अपने दिलो दिमाग से निकाल दिया बस यही से शुरू होती है दो सूफी संतों के वर्चस्व और चमत्कारों की लड़ाई।

इसलिए नहीं काटते बिच्छू 

बताया जाता है  कि सैयद सरबुद्दीन शाह विलायत इतने हंसमुख और अच्छे थे की उन्होंने बाबा शाह नसीरुद्दीन की  किसी बात का बुरा नही माना जब बाबा नसीरुद्दीन ने उन्हें पानी का का प्याल भिजवाया और कहा कि वो अमरोहा से कहीं और चले जाए इस पर शाह विलायत ने उन्हें पानी के प्याले में एक फूल रख कर भिजवाया और कहलवाया की हम इस अमरोहा में ऐसे रहना चाहते है जैसे पानी के ऊपर फूल। परन्तु कहते है न कि एक म्यान में दो तलवारे नही रह सकती ऐसा ही इन सूफी संतो के साथ हुवा बाबा नसीरुद्दीन ने गुस्से में आकर श्रॉफ दे दिया कि इस दरगाह में आज से सांप-बिच्छुओ का वास होगा यहां इन्शान आने से भी डरेगा यहाँ इस परिसर में ग्रामीणों के लापता गधे-घोड़े विचरण करेंगे और यही गंदगी भी करेंगे। बस यहीं से बिच्छुओं के इतिहास की कहानी शुरू होती है जैसा कि बाबा नसीरुद्दीन ने गुस्से में आकर दरगाह परिसर में सांप-बिच्छुओं के वास का श्रॉफ दे दिया था तो यहाँ के चप्पे चप्पे में बिच्छुओं का वास हो गया दीवारों पर, पेड़ो पर, झाड़ियों में, पत्थरों के निचे जहां देखो वहाँ बस बिच्छुओं का ही साम्राज्य था। बताया जाता है कि ऐसा होने के बाद सूफी संत सैयद सरबुद्दीन शाह विलायत ने कहा कि अल्लाह ने चाहा तो इस दरगाह की हद में कोई भी सांप-बिच्छु इन्शान तो क्या किसी दूसरे जानदार को भी कोई नुकशान नही पहुंचायेगे और ग्रामीणों का कोई भी मवेशी यहाँ गंदगी नही करेगा।

इतिहास गवाह उसके बाद आज तक किसी सांप-बिच्छु ने किसी इन्शान को कोई नुकशान नही पहुँचाया है और मजे की बात यह भी है कि इस परिसर में कोई घोडा या गधा लीद नही करता है। और तब से ही इस दरगाह का नाम बिच्छु वाले बाबा की दरगाह पड़ गया। मान्यता यह भी है कि यहाँ के बिच्छु को आप मन्नत के तौर पर बाबा से इज़ाज़त लेकर एक-दो हफ्ते या महीने के लिए घर भी ले जा सकते है और सच यह भी है कि इन बीते 800 सालो में हजारों जायरीनों ने मन्नतों के साथ बिच्छुओं को अपने घर भी ले गए है और तय समय सीमा के बाद वापस दरगाह परिसर में लाकर भी छोड़ा है आज तक ऐसी कोई जानकारी नही मिली है कि इस दरगाह में किसी बिच्छु ने किसी जायरीन को काटा हो या फिर घर ले जाने पर कोई नुकशान पहुंचाया हो। इस दरगाह की जियारत को जो भी जायरीन आते है वो कोतुहल वस ही सही पर एक बार यहां के बिच्छू को अपने हाथ पर जरूर बैठाता है। बहरहाल जो भी हो हिंदुस्तान ऐसी रोचक और चमत्कारिक कहानियो का सबसे बड़ा किरदार है यहां आस्था हमेशा ही खतरों को आसान बना देती है यह विश्वास और आस्था के संगम का जीता जागता सबूत है कि बिच्छू जैसा जहरीला और खतरनाक जीव दरगाह परिसर में किसी को नही काटता और वो ही बिच्छु दरगाह के बाहर जाते ही आपकी जान का दुश्मन बन जाता है।