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24
Nov

ऐसे ही बचेंगी देश की नदियाँ

बीते दिनों देश की सर्वोच्च अदालत में जस्टिस मदन लोकुर की पीठ ने महाराष्ट्र की दो नदियों उल्हास और वलधूनी में प्रदूषण करने पर महाराष्ट्र सरकार पर 100 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि जुर्माने की इस राशि से प्रदूषित इन दोनों नदियों को फिर से उनके मूल स्वरूप में लौटाया जायेगा। गौरतलब है कि साल 2015 में एनजीटी ने महाराष्ट्र की इन दो नदियों में भारी प्रदूषण करने पर 95 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। लेकिन राज्य सरकार ने एनजीटी के फैसले के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में अपील दायर की और स्टे ले लिया। इसके बाद ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में अपील दायर की। सर्वोच्च अदालत ने मामले की जाँच की। अदालत में नगर पालिकाओं ने कहा कि उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वह प्रदूषण के नुकसान की भरपाई कर सकें। इस पर अदालत ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को नदियों के संरक्षण के लिये 100 करोड़ देने का आदेश दिया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जुर्माने की राशि में से 50 करोड़ एक माह के अंदर जारी किये जायें। शेष रकम 25-25 करोड़ की दो किश्तों में दी जाये। इसके साथ ही अदालत ने मुख्य सचिव से कहा कि प्रदूषण फैलाने वाली उल्हास नगर की जींस रंगाई फैक्टरियों का बिजली-पानी का कनेक्शन तत्काल काटा जाये। देखा जाये तो सर्वोच्च अदालत का यह फैसला सराहनीय ही नहीं, बल्कि प्रशंसनीय है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है। क्योंकि देश की नदियों की प्रदूषण से मुक्ति की उम्मीद अब सरकारों से करना बेमानी हो गया है। कारण गंगा, यमुना सहित देश की तकरीब 70 फीसदी से अधिक प्रदूषित नदियाँ लाख कोशिशों और दावों के बावजूद आजतक साफ नहीं हो पाईं हैं। जबकि अकेली गंगा और यमुना की सफाई पर अभी तक हजारों करोड़ों रुपये की राशि स्वाहा हो चुकी है। गंगा को देश की राष्ट्रीय नदी का सम्मान प्राप्त है लेकिन हकीकत यह है कि आज वह पहले से और अधिक मैली हैं। हालात इसके जीते-जागते सबूत हैं।

दुख इस बात का है कि यह उस देश में नदियों की बदहाली की तस्वीर है जहाँ के लोग नदियों से सांस्कृतिक और पारम्परिक दृष्टि से जुड़े हुए हैं। वे नदियों को माँ मानते हैं, उनकी पूजा करते हैं और नदियों में स्नान कर खुद को धन्य मानते हैं। गंगा में डुबकी लगाना तो उनके लिये पुण्य का सबब है। उससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिए गंगा को मोक्षदायिनी, पुण्यसलिला और पतितपावनी कहा जाता है। अब सवाल उठता है कि इनके प्रदूषण के लिये कौन जिम्मेवार है। जाहिर सी बात है कि इन्हें हमीं ने प्रदूषित किया है। इसके लिये किसी और को दोष देना गलत होगा। इसके पीछे सबसे बड़ी बात यह है कि इन्हें हमने पूजा तो लेकिन इनके अत्यधिक दोहन में भी हमने कोताही नहीं बरती। इसके लिये क्या आम जनता, व्यापारी, उद्योगपति, प्रशासन, अधिकारी, नेता और सरकार सभी दोषी हैं। क्योंकि उन्होंने निजी स्वार्थ के लिये इसके दोहन को ही अपना प्रमुख लक्ष्य और उद्देश्य समझा।

इन्हें समृद्ध बनाने और इनके पोषण के बारे में उन्होंने सोचना मुनासिब ही नहीं समझा। जहाँ तक राजनैतिक दलों का सवाल है, उनके लिये नदियाँ और पर्यावरण कभी चुनावी मुद्दा रहा ही नहीं। उसी का परिणाम है कि आज नदियाँ नदियाँ न होकर कहीं नाले का रूप अख्तियार कर चुकी हैं, कहीं वह कुड़ाघर बन चुकी हैं, कहीं वह सूख गई हैं, कहीं मौसमी नदी बनकर रह गई हैं और कहीं उनका नामो निशान तक नहीं रह गया है। इन्हीं हालातों के मद्देनजर एनजीटी को यह कहने पर विवश होना पड़ा कि नदियाँ साफ होने के बजाय बीते सालों में और प्रदूषित होती चली गईं। यदि देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की बात करें तो पाते हैं कि उत्तर प्रदेश की सबसे प्रदूषित नदियों में हिंडन शीर्ष पर है। उसके बाद वरुणा, काली, गंगा और यमुना हैं। हिंडन में ऑक्सीजन का स्तर शून्य रह गया है। नदी में मानक से अधिक बैक्टीरिया होने के कारण इसका पानी जहरीला हो गया है। इसके अलावा गुजरात की अमलाखेड़ी, खारी, हरियाणा की मारकंदा, मध्य प्रदेश की खान, आंध्र प्रदेश की मुंशी, महाराष्ट्र की भीमा भी प्रदूषित नदियों के मामले में शीर्ष पर हैं।

बात जब नदियों के प्रदूषण मुक्ति की आती है तो सबसे पहले गंगा और यमुना का जिक्र आता है। गंगा की सफाई पर 1986 से काम जारी है। गंगा एक्शन प्लान इसका प्रमाण है। 2014 में राजग सरकार ने सत्ता में आने के बाद नमामि गंगे परियोजना प्रारंभ की। यह योजना भी 1986 में शुरू हुई तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्त्वाकांक्षी परियोजना के रूप में जानी गई। इसकी सफलता के लिये केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों की साख दाँव पर लगी। पहले उमा भारती को इसका जिम्मा सौंपा गया। उनका दावा था कि गंगा सफाई का नतीजा 2018 से नजर आने लगेगा। तीन साल में इस परियोजना पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत तकरीब 1515 करोड़ से अधिक खर्च भी हुए। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार और उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकायों ने मिलकर 2015 से 2017 तक कुल 7304 करोड़ 64 लाख खर्च किये लेकिन बदलाव कुछ नहीं हुआ। परियोजना की धीमी गति और प्रधानमंत्री जी की नाराजगी के बाद इसका जिम्मा अब नितिन गडकरी जी के पास है। अब कहा जा रहा है कि गंगा के 150 प्रोजेक्ट मार्च 2018 से काम शुरू करेंगे।

नदी में प्रदूषित पानी को जाने से रोकना व गंदे जल का पुनर्चक्रण कर बिजली से चलने वाले वाहनों के लिये ईंधन के रूप में बायो सीएनजी का उत्पादन करना है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी और उत्तराखण्ड के हरिद्वार में हाईब्रिड पीपीपी मोड में केन्द्र, राज्य और निजी कम्पनियों के सहयोग से सीवेज शोधन संयंत्र बनाये जायेंगे। इन पर मार्च 2018 में काम शुरू किया जायेगा। ये अगले दो साल में बनकर तैयार होंगे। इसके अलावा इलाहाबाद, कानपुर, हावड़ा, पटना, भागलपुर सहित कुल 10 शहरों में जो गंगा को सबसे अधिक प्रदूषित कर रहे हैं, में भी सीवेज शोधन संयंत्र लगाये जाने की योजना है। दरअसल अभी तो गंगा संरक्षण के लिये नया अधिनियम, गंगा में गाद की समस्या के लिये समिति, गंगा की स्वच्छता के लिये निकायों के गठन, राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्रबंधन निगम, गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा के लिये एक कानून और एकीकृत विकास परिषद के गठन की ही प्रक्रिया जारी है।

यही हाल यमुना का है जिसे बरसों पहले बड़े जोशोखरोश के साथ टेम्स बनाने का दावा किया गया था। यदि आज यमुना का जायजा लें तो स्थिति में सुधार की बात बेमानी है। यमुना में नालों का गिरना बदस्तूर जारी है। उसका हाल बदहाल है। वह बात दीगर है कि एनजीटी यमुना सफाई के मुद्दे पर बार-बार केन्द्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को चेतावनी दे रहा है, दिल्ली गेट और नजफगढ़ नालों में प्रदूषण स्तर कम किये जाने को लेकर रिपोर्ट जमा करने के निर्देश दे रहा है। उसने यमुना में कूड़ा-कचरा फेंकने पर और यमुना किनारे शौच करने पर प्रतिबंध लगाया और उल्लंघन करने पर 5000 रुपये दंड भी लगाया। और तो और कुछ बरस पहले आध्यात्मिक गुरू श्रीश्री रविशंकर ने इसी यमुना को शुद्ध करने का बीड़ा उठाया था। विडम्बना देखिये कि वही श्रीश्री रविशंकर हरे-भरे रहने वाले यमुना के तट को अपने संस्कृति महोत्सव के लिये तबाह किये जाने के कारण भी बने। इसके लिये एनजीटी ने उन्हें बेहद गैरजिम्मेदाराना बताया और उन्हें कड़ी फटकार लगाई। एनजीटी ने कहा कि इससे 420 एकड़ क्षेत्र प्रभावित हुआ जिसे पहले जैसा होने में तकरीब दस साल से ज्यादा का समय लगेगा।

कहने का तात्पर्य यह है कि नदियों के अस्तित्व की रक्षा के लिये बहुतेरे आंदोलन हुए। साधु-संत और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा यात्रायें भी निकाली गईं। अभी हाल-फिलहाल आध्यात्मिक गुरू जग्गी वासुदेव ने कोयंबटूर से दिल्ली तक की नदी बचाओ यात्रा की। इस यात्रा को व्यापक समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है। अब संत यह दावा कर रहे हैं कि हम नदियों खासकर गंगा को बचायेंगे। ऐसा दावा कुछ बरस पहले हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर भी संतों ने किया था। उसका हश्र क्या हुआ। इसलिए इन यात्राओं से कुछ नहीं होने वाला। अभी तक का इतिहास इसका सबूत है। हमारे उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी कहा कि नदियों से ही हमारा जीवन है। इन्हें संरक्षित रखना हमारा दायित्व है। इन्हें बचाने के लिये सभी लोगों को आगे आना होगा। उनका कथन बिल्कुल सही है।

गंगा हो या कोई और नदी, उसकी सफाई सिर्फ सरकार के बूते संभव नहीं है। इनको साफ रखने के लिये सभी लोगों की भागीदारी बेहद जरूरी है। क्योंकि इनके प्रदूषण के लिये हम ही तो जिम्मेदार हैं। जहाँ तक गंगा का सवाल है, गंगा में रोजाना तकरीब 20 लाख लोग डुबकी लगाते हैं। उमा भारतीजी का कहना बिल्कुल सही है कि गंगा जैसी 50-60 साल पहले थी, उसी तरह की स्वच्छता फिर से कायम करने के लिये जागरूकता के प्रयास करने होंगे। हमारे राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंदजी भी गंगा की निर्मलता और पवित्रता की अक्षुण्णता बनाये रखने की बात करते हैं। अब देखना यह है कि देश की बाकी नदियों की बात तो दीगर है, मोक्षदायिनी गंगा कब साफ होती है। हाँ अब इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देश की दूसरी नदियों के प्रदूषण मुक्ति का रास्ता जरूर खुलेगा। लगता है देश की नदियाँ इसी तरह बच पायेंगी। इसमें दो राय नहीं।

लेखक:  ज्ञानेन्द्र रावत

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