गोपाल कृष्ण गोखले
03
Apr

गोपाल कृष्ण गोखले

गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्गदर्शकों में से एक थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। गांधीजी उन्हें अपना राजनैतिक गुरु मानते थे। राजनैतिक नेता होने के आलावा वह एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने एक संस्था “सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी” की स्थापना की जो आम लोगों के हितों के लिए समर्पित थी। देश की आजादी और राष्ट्र निर्माण में गोपाल कृष्ण गोखले का योगदान अमूल्य है।
गोपाल कृष्ण गोखले एक ऐसी विभूति जिसने भारतीय जन-जीवन में स्वाधीनता का मन्त्र ऐसा फूका कि अंग्रेज हिल गये । एक ऐसे राजनीतिज्ञ जिन्हें गाँधी जी भी अपना राजनीतिक गुरु मानते थे और उनसे advice लेते थे ।

आरंभिक जीवन:

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को महाराष्ट्र के कोथापुर में हुआ था। उनके पिता कृष्ण राव एक किसान थे पर चूँकि क्षेत्र की मिट्टी कृषि के लिए अनुकूल नहीं थी इस कारण क्लर्क का काम करने पर मजबूर हो गए। उनकी माता वालूबाई एक साधारण महिला थीं।  पिता के असामयिक निधन ने गोपालकृष्ण को बचपन से ही सहिष्णु और कर्मठ बना दिया था। देश की पराधीनता गोपालकृष्ण को कचोटती रहती। राष्ट्रभक्ति की अजस्त्र धारा का प्रवाह उनके अंतर्मन में सदैव बहता रहता। इसी कारण वे सच्ची लगन, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता की त्रिधारा के वशीभूत होकर कार्य करते और देश की पराधीनता से मुक्ति के प्रयत्न में लगे रहते।
गोखले ने अपने बड़े भाई द्वारा आर्थिक सहायता से कोथापुर के राजाराम हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। बाद में वह मुंबई चले गए और 1884 में 18 साल की उम्र में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। गोपाल कृष्ण उस समय के किसी भी भारतीय द्वारा पहली बार कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने वाले चंद लोगों में से एक थे। उन्हें नवोदित भारतीय बौद्धिक समुदाय और पूरे भारत वर्ष में व्यापक रूप से सम्मानित किया गया। गोखले शिक्षा के महत्त्व को भली-भांति समझते थे। उनको अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण वो बिना किसी हिचकिचाहट और अत्यंत स्पष्टता के साथ अपने आप को अभिव्यक्त कर पाते थे।

अध्यापन के रूप में गोखले की सफलता देखकर बाल गंगाधर तिलक व प्रोफ़ेसर गोपाल गणेश आगरकर का ध्यान उनकी ओर गया। उन्होंने गोखले को मुंबई स्थित ‘डेकन एजुकेशन सोसाइटी’ में सम्मिलत होने का आमन्त्रण दिया. गोखले सन 1886 में इस सोसाइटी के स्थायी सदस्य बन गये। गोपाल कृष्ण गोखले ने 20 वर्ष तक शिक्षक के रूप में कार्य किया।

1886 में वह फर्ग्यूसन कालेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी में सम्मिलित हुए। वह श्री एम.जी. रानाडे के प्रभाव में आए। सार्वजनिक सभा पूना के सचिव बने। 1890 में कांग्रेस में उपस्थित हुए। 1896 में वेल्बी कमीशन के समज्ञा गवाही देने के लिए वह इंग्लैण्ड गए। वह 1899 में बम्बई विधान सभा के लिए और 1902 में इम्पीरियल विधान परिषद के निर्वाचित किए गए। वह अफ्रीका गए और वहां गांधी जी से मिले। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की भारतीय समस्या में विशेष दिलचस्पी ली। अपने चरित्र की सरलता, बौद्धिक क्षमता और देश के प्रति दीर्घकालीन स्वार्थहीन सेवा के लिए उन्हें सदा सदा स्मरण किया जाएगा। वह भारत लोक सेवा समाज के संस्थापक और अध्यक्ष थे। उदारवादी विचारधारा के वह अग्रणी प्रवक्ता थे।

गोखले के जीवन पर महादेव गोविन्द रानाडे का प्रबल प्रभाव था। वे सन 1887 में रानाडे के शिष्य बन गये। रानाडे ने उन्हें सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में 15 वर्ष तक प्रशिक्षित किया और ईमानदारी, सार्वजनिक कार्यो के प्रति समर्पण व सहनशीलता का पाठ सुनाया।

उन्होंने ब्रिटिश राजनेताओ और जनता के सामने भारत की सही तस्वीर प्रस्तुत की। अपने 45 दिन के प्रवास के दौरान उन्होंने विभिन्न शहरो में प्रभावपूर्ण 45 सभाओ को संबोधित किया। श्रोता मन्त्र – मुग्ध होकर उन्हें सुनते. निःसंदेह गोखले भारत का पक्ष प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने में सर्वाधिक सक्षम नेता थे।
पूना में गोखले न्यायाधीश रानाडे के संपर्क में आये। वह रानाडे के जीवन और विचारों से बहुत प्रभावित हुए। रानाडे एक बड़े देशप्रेमी और समाज-सुधारक थे। उन्होंने एक पत्र प्रकाशित किया। गोखले इस पत्र के संपादक हो गए। भारत के इतिहास और स्वतंत्रता आन्दोलन में गोपाल कृष्ण गोखले का नाम सदैव याद रखा जायेगा।

सर्वंट्रस ओफ सोसायटी स्थापना:

सन 1905 में गोखले जब कांग्रेस के प्रेसिडेंट बने तो वे राजनैतिक ताकत के चरम पर थे और इसी समय उन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की। इसकी स्थापना के पीछे उनका मत था कि भारतीयों को शिक्षित किया जाये। गोखले के अनुसार, “जब भारतीय शिक्षित होंगे तो वे अपने देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझेंगे और इसका निर्वाह भली – भांति करेंगे”। उनके अनुसार तत्कालीन शिक्षण प्रणाली और इंडियन सिविल सर्विसेस भारतीयों के विकास के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी ताकि भारतीयों का संपूर्ण विकास हो सकें और वे राजनीतिक शिक्षा ग्रहण कर, इस क्षेत्र में भी अपना पूर्ण योगदान देने में सक्षम हो, जिससे भारत को आज़ादी दिलाई जा सकें। इस सोसाइटी ने कई स्कूल, कॉलेज की स्थापना की, इनके द्वारा रात्रि में कक्षाएं लगायी जाती थी, ताकि कार्यरत लोग भी सुविधा के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकें।

बंग-भंग का नेतृत्व:

फूट-डालो और शासन करो की नीति के तहत वायसराय लार्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पूरे देश में बंग-भंग का विरोध किया गया। बंगाल से लेकर देश के अन्य हिस्सों में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के स्वीकार का जबर्दस्त आन्दोलन चल पड़ा। एक तरफ जहां बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चन्द्र पाल और अरविन्द घोष जैसे गरम दल के नेताओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया वहीं नरम दल की तरफ से गोपाल कृष्ण गोखले ने इसकी अगुवाई की। उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के साथ ही देश में व्याप्त छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ आंदोलन चलाया। वह जीवनभर हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम करते रहे। गोखले की प्रेरणा से ही गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ आंदोलन चलाया।

गोखले अपने अंतिम वर्षो में भी राजनैतिक जीवन में सक्रीय थे। वे अपने जीवन में अंतिम वर्षो में भी विदेशी यात्रा करते, 1908 में उन्होंने इंग्लैंड की ट्रिप की, साथ ही 1912 में वे साऊथ अफ्रीका भी गये, जहा उन्होंने देखा की महात्मा गांधीजी वहा रहने वाले भारतीयों की परिस्थितियों में सुधार कर रहे है, तो गोखले ने भी उनका साथ दिया। साथ ही वे भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस, भारतीय कर्मचारी संस्था और कानूनी संस्थाओ के साथ मिलकर ब्रिटिश राज को खत्म करने का प्रयास कर रहे थे। वे भारत में शिक्षा प्रणाली को विकसित करना चाहते थे, ताकि युवाओ को अच्छे से अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सके। इन सभी विचारो ने उन्हें बहोत क्षति पहोचाई, और अंत में 19 फेब्रुअरी 1915 को 49 साल की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी। बाल गंगाधर तिलक जो हमेशा से उनके राजनैतिक विरोधी थे, उन्होंने उनके दाह-संस्कार में कहा की, “भारत का यह हीरा, महाराष्ट्र का अनमोल रत्न, कर्मचारियों का बादशाह शाश्वत रूप से इस जमीन पर विश्राम कर रहा है। उनकी तरफ देखो और उनका अनुकरण करो”. गोखले हम सभी के लिए अनश्वर और अमर व्यक्ति थे।

इतिहासकार एच.एन. कुमार का कहना है कि अधिकतर लोग गोखले को सिर्फ महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु के रूप में ही जानते हैं लेकिन वह सिर्फ राष्ट्रपिता ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना के भी राजनीतिक गुरु थे। उनका मानना है कि यदि आजादी के समय गोखले जीवित होते तो शायद जिन्ना देश के बंटवारे की बात रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

इतिहास के प्रोफेसर के.के. सिंह का कहना है कि गांधी जी को अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा गोखले से ही मिली थी। उन्हीं की प्रेरणा से गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आंदोलन चलाया। उन्होंने कहा कि गांधी जी के आमंत्रण पर 1912 में गोखले खुद भी दक्षिण अफ्रीका गए और रंगभेद की निन्दा की तथा इसके खिलाफ आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।

जन नेता कहे जाने वाले गोखले एक नरमपंथी सुधारवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ ही देश में व्याप्त जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ भी संघर्ष किया। वह जीवनभर हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम करते रहे और मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना। यह बात अलग है कि बाद में जिन्ना देश के बंटवारे का कारण बने और गोखले द्वारा दी गई शिक्षा का पालन नहीं किया।

मृत्यु:

गोखले अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी राजनैतिक रूप से सक्रीय रहे। जिसमें उनकी विदेश यात्राएं और विदेशों में होने वाले आंदोलनों और सुधार कार्यक्रमों में योगदान भी शामिल हैं। इसके साथ – साथ वे स्वयं के द्वारा स्थापित सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी के कार्यों में और शिक्षण प्रणाली के विकास और उत्थान हेतु भी कार्यरत रहे। उनकी मृत्यु 19 फरवरी, सन 1915 को हुई, उस समय उनकी आयु मात्र 49 वर्ष थी। उनके अंतिम संस्कार के समय उनकी आजीवन प्रतिद्वंदी रहे बाल गंगाधर तिलक ने कहा था –“भारत का हीरा, महाराष्ट्र का आभूषण, श्रमिकों का राजकुमार.. यहाँ इस स्थान पर परालौकिक विश्राम ग्रहण कर रहा हैं. उनकी ओर देखिये और उनके जैसा आचरण करने का प्रयास कीजिये”।

Related Post