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26
Feb

जीवामृत

जीवामृत एक अत्यधिक प्रभावशाली जैविक खाद है जो पौधों की वृद्धि और विकास में सहायता करता है तथा पौधों की विभिन्न रोगाणुओं से सुरक्षा करता है तथा पौधों की प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाता है जिससे पौधे स्वस्थ बने रहते हैं तथा फसल से एक अच्छी पैदावार मिलती है | जीवामृत दो रूपों में बनाया जाता है-

1. तरल जीवामृत 2. घन जीवामृत

तरल जीवामृत बनाने की विधि
आवश्यक सामिग्री
तरल जीवामृत निम्नलिखित सामिग्री से बनाया जाता है-
• 10 किलो देशी गाय का गोबर (देशी बैल या भैंस का भी ले सकते हैं)
• 10 लीटर गौमूत्र (देशी बैल या भैंस का भी ले सकते हैं)
• 1 किलो पुराना सड़ा हुआ गुड़ या 4 लीटर गन्ने का रस (नया गुड़ भी ले सकते हैं)
• 1 किलो किसी भी दाल का आटा (मूंग, उर्द, अरहर, चना आदि का आटा)
• 1 किलो सजीव मिट्टी (बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की मिट्टी या ऐसे खेत या बांध की 1 से 2 इंच मिट्टी जिसमें कीटनाशक न डाले गए हों )
• 200 लीटर पानी

नोट-
बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की मिट्टी सबसे अच्छी होती है क्योंकि बरगद और पीपल के पेड़ हर समय ऑक्सीजन देने वाले पेड़ हैं और ज्यादा ऑक्सीजन देने वाले पेड़ के नीचे जीवाणुओं की संख्या अधिक होती है | ये जीवाणु खेत के लिए बहुत ही आवश्यक एवं लाभदायक हैं |

बनाने की विधि
• सबसे पहले 10 किलोग्राम देशी गाय का गोबर, 10 लीटर देशी गौमूत्र, 1 किलोग्राम पुराना सड़ा हुआ गुड़ या 4 लीटर गन्ने का रस, 1 किलोग्राम किसी भी दाल का आटा, 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी एवं 200 लीटर पानी को एक मिट्टी के मटके या प्लास्टिक की टंकी में डालकर अच्छी तरह मिश्रण करें |

• अब इस मिश्रण को 3 दिन तक किण्वन क्रिया के लिये छावं में रखें तथा दिन में 3 बार (सुबह, दोपहर व शाम) लकड़ी से घोलें |

• 3 दिन के बाद जीवामृत उपयोग के लिए बनकर तैयार हो जायेगा | यह मात्रा एक एकड़ भूमि के लिये पर्याप्त है |
देशी गाय के 1 ग्राम गोबर में लगभग 500 करोड़ जीवाणु होते हैं | जब हम जीवामृत बनाने के लिए 200 लीटर पानी में 10 किलो गोबर डालते हैं तो लगभग 50 लाख करोड़ जीवाणु डालते हैं | जीवामृत बनते समय हर 20 मिनट में उनकी संख्या दोगुनी हो जाती है | जीवामृत जब हम 3 दिन तक किण्वन के लिए रखते हैं तो उनकी संख्या अरबों-खरबों हो जाती है | जब हम जीवामृत भूमि में पानी के साथ डालते हैं, तब भूमि में वे सूक्ष्म जीव अपने खाने-पकाने के कार्य में लग जाते हैं तथा पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं |

तरल जीवामृत की प्रयोग विधि
आप जिस खेत में सिंचाई कर रहे हैं उस खेत के लिए पानी ले जाने वाली नाली के ऊपर ड्रम को रखकर धार इतनी रखें कि खेत में पानी लगने के साथ ही ड्रम खाली हो जाए | जीवामृत पानी में मिलकर अपने आप फसलों की जड़ों तक पहुँचेगा | जीवामृत महीने में दो बार पानी के साथ प्रति एकड़ 200 लीटर हर बार दीजिए | अगर पानी नहीं देना हो तो जीवामृत को मिट्टी पर भी छिड़का जा सकता है | थोड़ा बहुत पत्तों पर पड़ जायेगा तो कोई नुकसान नहीं होगा | फलों के पेड़ों की दोपहर 12 बजे के समय जो छाया पड़ती है उस छाया के बाहर की कक्षा के पास 1.0-1.5 फुट पर चारों तरफ से नाली बनाकर प्रति पेड़ 2 से 5 लीटर हर महीने में दो बार दीजिए | जीवामृत छिडकते समय भूमि में नमी होनी चाहिए | हालांकि जीवामृत का प्रयोग बनाने के 6-7 दिनों के बाद भी किया जा सकता है लेकिन अधिक समय हो जाने के साथ-साथ इसमें बदबू बढ़ जाती है, इसलिए तैयारी के 3-4 दिनों के भीतर इसका उपयोग करने के लिए सलाह दी जाती है |

जीवामृत का प्रयोग आप गेहूँ, मक्का, बाजरा, धान, मूंग, उर्द, कपास, सरसों,मिर्च, टमाटर, बैंगन, प्याज, मूली, गाजर आदि तथा अन्य सभी प्रकार के फल पेड़ों में महीने में दो बार कर सकते हैं |

घन जीवामृत बनाने की विधि
आवश्यक सामिग्री
घन जीवामृत निम्नलिखित सामिग्री से बनाया जाता है-
• 100 किलोग्राम देशी गाय का गोबर
• 5 लीटर देशी गौमूत्र
• 2 किलोग्राम देशी गुड़
• 2 किलोग्राम दाल का आटा
• 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी

बनाने की विधि
• सबसे पहले 100 किलोग्राम देशी गाय का गोबर लें और उसमें 2 किलोग्राम देशी गुड़, 2 किलोग्राम दाल का आटा और 1 किलोग्राम सजीव मिट्टी डालकर अच्छी तरह मिश्रण बना लें |
• अब इस मिश्रण में थोड़ा-थोड़ा गौमूत्र डालकर उसे अच्छी तरह मिलाकर गूंथ लें ताकि उसका घन जीवामृत बन जाये |
• अब इस गीले घन जीवामृत को छाँव में अच्छी तरह फैलाकर सुखा लें |
• सूखने के बाद इसको लकड़ी से ठोक कर बारीक़ कर लें तथा इसे बोरों में भरकर छाँव में रख दें |
• यह घन जीवामृत आप 6 महीने तक भंडारण करके रख सकते हैं |

घन जीवामृत की प्रयोग विधि
घन जीवामृत को जब हम भूमि में डालते हैं, तब नमी मिलते ही घन जीवामृत में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु कोष तोड़कर समाधि भंग करके पुन: कार्य में लग जाते हैं | किसी भी फसल की बुवाई के समय प्रति एकड़ १०० किलोग्राम जैविक खाद और २० किलोग्राम घन जीवामृत को बीज के साथ बोइये | इससे बहुत ही अच्छे परिणाम मिलते हैं | इससे आप रासायनिक खादों से ज्यादा उपज ले सकते हैं | बीज बोते समय बोने का जो औजार है उसमे दो नलियों का बाउल लगाएं | एक बाउल से बीज बोयें और दूसरे बाउल से यह जैविक खाद और घन जीवामृत का मिश्रण बोयें | या आपके इलाके में बीज बोने की जो भी विधि हो, उससे ये दोनों बोयें |

जीवामृत के उपयोग से लाभ
1. पौधे को अधिक सर्दी और अधिक गर्मी से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है |
2. फूलों और फलों में वृद्धि करता है |
3. प्रत्येक प्रकार की फसलों के लिए लाभदायक है |
4. इसमें कोई भी नुकसान देने वाला तत्व या जीवाणु नही है |
5. फल,सब्जी, अनाज देखने में सुंदर और खाने में स्वादिष्ट होते है |
6. पौधों में बिमारियों के प्रति लड़ने की शक्ति बढ़ाता है |
7. मिट्टी में से तत्वों को लेने और उपयोग करने की क्षमता बढ़ती है |
8. बीज की अंकुरन क्षमता में वृद्धि होती है |
9. इससे फसलों और फलों में एकसारता आती है तथा पैदावार में वृद्धि होती है |

जीवामृत का भूमि में कैसे प्रभावी है ?
1. भूमि में केचुआ और अन्य लाभदायक सूक्ष्म जीव जैसे- शैवाल, कवक, प्रोटोजोआ व बैक्टीरिया इत्यादि में वृद्धि होती है जो पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं |
2. भूमि की प्राकृतिक ताकत में वृद्धि होती है |

3. भूमि के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों में सुधार होता है जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है |

हम जब भूमि में जीवामृत डालते हैं, तब 1 ग्राम जीवामृत में लगभग 500 करोड़ जीवाणु डालते हैं | वे सब पकाने वाले होते हैं | भूमि तो अन्नपूर्णा है लेकिन जो है, वह पका हुआ नहीं है | पकाने का काम ये जीवाणु करते हैं | जीवामृत उपयोग में लाते ही इसके जीवाणु हर प्रकार के अन्नद्रव्य (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, लोहा, गंधक, जिंक आदि) को पकाकर पौधों की जड़ों को उपलब्ध कराते हैं | भूमि पर जीवामृत डालते ही एक और चमत्कार होता है, भूमि में करोड़ों केंचुए अपने आप काम में लग जाते हैं, उन्हें बुलाना नहीं पड़ता | ये केंचुए भूमि के अन्दर लगभग 15 फुट से खाद पोषक तत्वों से समृद्ध मिट्टी माल के माध्यम से भूमि की सतह के ऊपर डालते हैं, जिसमें से पौधे अपने लिए आवश्यक सभी खाद पोषक तत्व बड़ी ही सुलभता से चाहे जितनी मात्रा में ले लेते हैं | घने जंगलों में अनगिनत फल देने वाले पेड़ पौधे कैसे जीते हैं ? वे अन्नद्रव्य कहाँ से लेते हैं ? उन्हें केंचुए और सूक्ष्म जीव-जन्तु ही खिलाते और पिलाते हैं | इन केंचुओं के मल में मिट्टी से सात गुना ज्यादा नाइट्रोजन, नौ गुना ज्यादा फास्फोरस, ग्यारह गुना ज्यादा पोटाश, छह गुना ज्यादा कैल्शियम, आठ गुना ज्यादा मैग्नीशियम, व दस गुना ज्यादा गंधक होता है | यानि फसलों और फल पेड़-पौधों को जो जो चाहिए वह प्रचुर मात्रा में होता है | केंचुओं की विष्टा खाद तत्वों का महासागर है | जीवामृत डालने से केंचुए यह महासागर पेड़-पौधों की जड़ों को उपलब्ध कराते हैं | ये अनगिनत सूक्ष्म जीव-जन्तु और केंचुए तभी अच्छा काम करते हैं जब उन्हें भूमि के ऊपर 25 से 30 सेंटीग्रेड तापमान 65 से 70 प्रतिशत नमी और भूमि के अँधेरा और बायोमास मिलती है | इसे सूक्ष्म पर्यावरण या विशिष्ट पारिस्थतिकी कहते हैं | जब हम भूमि पर आच्छादन डालकर भूमि को ढक देते हैं तब यह विशेष पर्यावरण अपने आप तैयार हो जाता है | हमें कुछ विशेष नहीं करना पड़ता |

अत: हम कह सकते हैं कि गोबर में जीवाणु होते हैं, और यह मिश्रण मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या बढ़ाता है | जमीन ढकने के लिए प्रयोग किया गया कृषि अवशेष/बायोमास उन जीवाणुओं का भोजन बनता है जिससे कृषि अवशेषों में मौजूद तत्व फसल के उपयोग लायक बन जाते हैं | इस तरह पौधों को पर्याप्त पोषण मिल जाता है और मिट्टी की पानी सोखने की ताकत बढ़ जाती है |

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