निराई माता
11
May

निराई माता मंदिर – साल में सिर्फ पांच घंटे खुलता है, देवी का यह मन्दिर

हर एक धार्मिक स्थल का अपना अपना रहस्य और महत्व होता है जो किसी और जगह पर शायद नहीं होता है .भारत में तो ऐसे स्थानों की कोई कमी नहीं है ऐसे ही मंदिरों में शामिल एक निराई माता मंदिर के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं जहा देवी के लिए ज्योत स्वत ही जल जाती है लेकिन साल में इस मंदिर के कपाट सिर्फ पांच घंटे के लिए खुलते है बाकी साल के दिनों में मंदिर के कपाट बंद रहते है.छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित निराई माता मंदिर श्रद्घालुओं एवं भक्तों का आकर्षण का केंद्र है यह मंदिर साल में एक ही बार खुलता है और वो भी केवल सुबह 4 बजे से 9 बजे तक यानि महज सिर्फ  5 घंटे के लिए ही लेकिन इन पांच घंटों में माता के दर्शनों के लिए हजारों भक्त देश के दूर-दराज इलाकों से आते हैं.

नवरात्रि में स्वतः प्रज्जवलित होती है ज्योत

निराई माता के मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वतः ही ज्योति प्रज्जवलित होती है. जो लगातार नवरात्रों के नौ दिन तक बिना तेल या दीपक के जलती रहती है. यह कैसे प्रज्ज्वलित होती है और क्यों होती है .यह आज तक एक रहस्य ही बना हुआ है.इस चमत्कार के चलते ग्रामीण यहां पूजा-अर्चना करते हैं .स्थानीय निवासियों के अनुसार निरई माता की उंची पहाड़ी में जातरा के एक सप्ताह पूर्व प्रकाश पुंज ज्योति के समान चमकता हैं. चैत नवरात्रि के प्रथम सप्ताह रविवार को जातरा मनाया जाता हैं. अगर कोई माता के दर्शन के लिए शराब सेवन किया हुआ या बुरा सोचने वाला आ जाए तो उस व्यक्ति को मधुमक्खियों का कोप भाजन बनना पड़ता है.इस मंदिर में महिलाओं को अंदर प्रवेश तथा पूजा-पाठ की अनुमति नहीं है महिलाओं को तो यहां प्रसाद खाना भी वर्जित है अगर कोई महिला ऐसा कर लें तो उसे कुछ-न-कुछ बुरा भुगतना पड़ता है भारत में ऐसे अनेक मंदिर है जहा महिलाओ के प्रवेश निषेध है बस यह भी उन्ही मंदिरों में से एक है जहा केवल पुरुष ही यहां पर पूजा-पाठ करते हैं और वही प्रसाद ग्रहण करते है.

होती है हजारों बकरों की बलि

मान्यता है कि मां से मांगी गई मान्यता के पूरी होने पर माता को भेंटस्वरूप कुछ न कुछ जरूर अर्पण करना चाहिए अतः बहुत से लोग यहां आकर माता को जानवरों की बलि चढ़ाते हैं. अर्थात यहाँ पशु बलि दी जाती है चैत्र नवरात्रों के पहले दिन जब मंदिर भक्तों के लिए खोला जाता है, उस समय यहां हजारों श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर जानवरों खास तौर पर बकरों की बलि चढ़ाते हैं हालांकि मनुष्य को अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए किसी निर्दोष की बलि नहीं देनी चाहिए लेकिन फिर भि९ भक्त यहाँ बकरे की बलि देते है.