बाल काण्ड
17
Oct

बाल काण्ड- श्री रामचरित मानस

बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल , कपट , नही होता। विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है, उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। बालक की भाँति अपने मान अपमान को भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है। बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा। जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है।

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