बाल श्रम
23
Oct

बाल श्रम पर कायम है बेरुखी

बाल मजदूरी के अलावा बच्चों के यौन शोषण और तस्करी के लिए उनके अपहरण और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा भी दुनिया भर के लिए चिंता के मुद्दे हैं। दुनिया भर में करीब 12 लाख बच्चे हर साल बेघर होते हैं, कुछ मां-बाप आर्थिक मजबूरी के कारण उन्हें खुद से अलग करते हैं और बाकी ज्यादातर अपहरण कर अपने माता पिता से पिता वंचित कर दिए जाते हैं। ऐसे बच्चों को अनैतिक कार्य में इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें प्रमुख हैं तस्करी और मादक पदार्थों की ट्रैफिकिंग, यौन शोषण, भीख मंगवाना और अन्य अपराधों में इस्तेमाल करने के अलावा सरकार विरोधी नक्सल जैसी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाना। कहीं-कहीं युद्ध में भी दुश्मन देश के खिलाफ अपहृत किए बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे बच्चे हिंसा का भी शिकार होते हैं। दुनिया की विभिन्न संस्थाएं बच्चों की तस्करी को लेकर चिंतित हैं लेकिन भारत में भी ना तो सरकार उतनी चिंतित है, न समाज। गुम होने वाले बच्चों की चिंता भी परिवार तक सीमित होकर रह जाती है। भारत सरकार ने कहने को तो बाल अधिकार संरक्षण आयोग जैसी महत्वपूर्ण इकाइयां गठित की हुई हैं, लेकिन ब्यूरोक्रेसी ने उन्हें रिटायरमेंट के बाद सरकारी सुविधाएं मिलते रहने का स्थान बनाकर गिरवी रख लिया है। जिसे सब कुछ बदल देने की इच्छा शक्ति वाली सरकार भी नहीं बदल पाई।

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का मूल काम बाल मजदूरी के खिलाफ रहा है। उन्होंने अपने काम का दायरा भारत से बाहर तक फैलाया, खासकर दक्षिण एशियाई देशों में। उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार भी असल में उनके बाल मजदूरी पुरस्कार भी असल में उनके बाल मजदूरी बाल मजदूरी विरोधी आंदोलन और संघर्ष के कारण ही मिला है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकारों संबंधी प्रोटोकॉल पर दस्तखत करने के 25 साल बाद भी भारत के 707 जिलों में से 90% जिलाधीश बाल अधिकारों और बच्चों से संबंधित में कानून से परिचित नहीं है, ऐसे में हम समाज में पूर्ण जागृति की कल्पना कैसे कर सकते हैं। भारत सरकार ने कानून बनाकर कुछ पहल की है। किशोर न्याय अधिनियम बनाया गया। शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया। बाल मजदूरी रोकने के लिए नया कानून बनाया गया। बच्चों से यौन अपराध करने वालों के खिलाफ 2012 में पोक्सो नाम का कड़ा कानून कानून बनाया गया। हाल ही में कैलाश सत्यार्थी के साथ बातचीत में उन्होंने हरियाणा का एक मजेदार किस्सा सुनाया, जिसमें 13 साल की एक बच्ची को भगा कर लाया गया था और काजी ने निकाह पढ़ा दिया था। जब बच्ची के मां बाप बाप की शिकायत पर एनजीओ के कार्यकर्ता पुलिस थाने पहुंचे और उन्होंने पोक्सो कानून दिखाया गया, तो थानेदार ने एनजीओ कार्यकर्ताओं को डांटते हुए कहा कि भारत में अमेरिका का कानून दिखा रहे हो। कानून बनाकर वकीलों की अलमारियों में सजाकर रखने का क्या फायदा, जब वे सरकारी कर्मचारी और समाज तक न पहुँच सके।

यह अच्छी बात है कि शांति का नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद कैलाश सत्यार्थी ने अपने काम का दायरा बाल मजदूरी के अलावा बच्चों से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी बढ़ाया है। 2014 में नोवल मिलने के बाद पिछले साल उन्होंने “कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन” नाम से एक नया एनजीओ खड़ा किया है। एनजीओ बनते ही उनका आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के साथ एक समझौता हुआ, जिसमें इस अंतरराष्ट्रीय संगठन ने बच्चों की गरीबी और शोषण से मुक्ति के लिए मिलकर काम करने का संकल्प किया है। 50 देशों के संगठन की सदस्यता के लिए भारत और चीन भी अभी दहलीज पर खड़े हैं। कैलाश सत्यार्थी की इस नई संस्था ने बच्चों के यौन शोषण तस्करी के लिए उन्हें अपहरण और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा के खिलाफ जन जागृती फैलाने का काम अपने हाथ अपने हाथ फैलाने का काम अपने हाथ अपने हाथ अपने हाथ में लिया है। कैलाश सत्यार्थी ने ही 20 साल पहले 1997 में बाल मजदूरी के ख़िलाफ़ कन्याकुमारी से कश्मीर और फिर दिल्ली तक जन जागृति पैदा की थी।

अजय सेतिया, अमर उजाला 6 अगस्त 2017