विदाई
15
Feb

भारतीय शादी में विदाई के पल बहुत खास होते हैं

शादी में वर और वधु पक्ष की तरफ से कई प्रकार की रस्में निभाई जाती है। इनमें से एक रस्म दुल्हन की विदाई की भी होती हैं। वैसे तो शादी की सभी रस्में खास होती है लेकिन विदाई का पल दुल्हन और उसके परिवार के लिए बहुत इमोशनल होता है। यह वो समय होता है जब लड़की अपने मायके को छोड़कर ससुराल जाती है और यही पल हर किसी के लिए अनमोल होता है। आज हम आपको इस इमोशनल पल और रस्म के महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।

 

1. पापा की परी

‘पापा’ मात्र एक संबोधन नहीं है, बल्कि ‘पुरुष’ के कोमल स्वरूप की वो अभिव्यक्ति है जहां ‘बेटी’ परी बन पुष्पित और पल्लवित होती है।

वैसे तो इस पल को लेकर लड़की के माता-पिता दोनों ही इमोशनल होते हैं लेकिन सबसे ज्यादा आंसू एक पिता की आंखों में ही आते हैं। इन इमोशनल पलों के दौरान यह बहुत जरूरी है कि उसका दूल्हा, दुल्हन के माता-पिता को यह वचन दें कि वह न सिर्फ उसका साथ देगा बल्कि पिता की ही तरह उसका ख्याल भी रखेगा।

साइकालजी आफ फ्रायड के अनुसार बेटी के जीवन में पहला पुरुष उसका पिता होता है और वहीं से उसका अवचेतन मन एक धारणा और काल्पनिक चरित्र बना लेता है, जो हूबहू उसके पिता जैसा ही होता है। यह धारणा व काल्पनिक चरित्र किसी भी स्त्री के जीवन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि पिता के बाद हर रिश्ते में वह यही खोजती है। शादी के बाद वही स्त्री अपने पति में भी अपने पिता को ढूंढ़ती है। फिर पति का व्यक्तित्व जितना अधिक पिता से मिलता है उतना ही अधिक उसका अवचेतन मन संतुष्ट रहता है। दरअसल, पिता-बेटी का रिश्ता स्नेह की उत्कर्षता का पर्याय है, जहां पिता अप्रत्यक्ष तौर पर बेटी के मन में ‘पुरुष’ का चरित्र गढ़ देता है। बेटी भी पिता द्वारा गढ़े और रचे रेखाचित्र को ही हर रिश्ते में पाना चाहती है।

2. दुल्हन का अपने पीछे चावल फेंकना

शादी के दौरान जब दूल्हे का आगमन लड़की के घर पर होता है तो उस समय दरवाजे की पूजा की जाती है। इस दौरान वधु पक्ष की ओर से लड़के पर चावल फेंके जाते हैं। इस रस्म को करने से दोनों युगल जोड़ी के जीवन में खुशहाली और सुखसमृद्धि बनी रहती है।

चावल फेंकने के पीछें एक मान्यता यह भी है कि इससे नव-विवाहित जोड़े को संतान सुख की प्राप्ति होती है और उनका भाग्य हमेशा साथ देता है। और कई जगहो पर इस रस्म के दौरान दुल्हन की झोली में चावल और हल्दी डाली जाती है। इसका मतलब यह होता है कि जिस घर लड़की आई है वहां और उसके जीवन में हमेशा सुख-समद्धि बनी रही है।

एक मान्यता यह भी छिपी है कि बेटी अपने माता-पिता को उन सब चीजों के लिए धन्यवाद कर रही है, जो उन्होने बचपन से लेकर अब तक उनके लिए की है।

विदाई की रस्में यह भी दर्शाती हैं कि दुल्हन अपने माता-पिता को उनके पालन-पोषण की याद दिलाती है। जैसे ही दुल्हन अपने हाथ में चावल लेकर अपने पीछे की ओर फेंकती है, उसके माता-पिता और अन्य करीबी परिवार के सदस्य इसे अपने पल्लू में ले लेते हैं।

3. पिता का आशीर्वाद

विदाई के इस इमोशनल पर हर माता-पिता दूल्ह-दुल्हन को यह आर्शीवाद देते हैं कि वह हमेशा खुश रहे और उनकी बेटी को कोई तकलीफ न हो।

4. भाई की लाडली

माता-पिता के साथ भाई भी दूल्हे का हाथ पकड़कर उसे अपनी बहन का ख्याल रखने के लिए कहता है। इसके बाद वह बहन को विदा करने के लिए एक रस्म निभाता है। जब दुल्हन अपने पति के साथ कार में बैठकर विदा होती है तो भाई कार को धक्का देकर उसे विदा करता हैं।

5. बेटी की बिदाई- मां के लिए चुनौती

बच्चों की परवरिश में मां की भूमिका अहम होती है। विशेषकर बेटी की मां की, क्योंकि उसे अपने जिगर का टुकड़ा, नाजों से पली लाड़ो को, प्यारी-सी गुड़िया को नितांत ही अजनबी परिवार को सौंपना होता है। शिक्षा देकर ही कर्तव्य की इतिश्री नहीं होती बल्कि व्यावहारिक समझ, रिश्तों की नाजुकता व संबंधों की नजाकत को समझने के संस्कार देने होते हैं, साथ ही कैसे अपना आत्मविश्वास व आत्मसम्मान बनाए रखते हुए नए परिवार के साथ खुद को आत्मसात कर सबसे अपनत्व व स्नेह-बंध निर्मित करना- यह सिखाना होता है। पति ही नहीं, परिवार से बंधने व उन्हें बांधकर रखने का गुर बताना होता है। बिटिया को बचपन व किशोरावस्था से ही ससुराल के प्रति न तो अत्यधिक भय दिखाती है, न ही आवश्यकता से अधिक अपेक्षाओं के सपने दिखाती है।

6. नए जीवन की शुरुआत

भारतीय विवाह उन रस्मों से भरे हुए हैं, जो सुदंर होने के साथ महत्वपूर्ण और भावनात्मक भी हैं। शादी की सभी रस्मों के बाद दूल्हा-दुल्हन अपने नए और खुशहाल जीवन की शुरूआत करते हैं।

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