farming problems
04
Dec

भारत में खेती की समस्याएँ

महात्मा गाँधी ने बहुत पहले कहा था “भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।” तत्पश्चात स्वतन्त्रता की प्राप्ति के समय भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु ने खेती की उपादेयता एवं तात्कालिकता को इंगित करते हुए स्पष्ट कहा था, “दूसरी हर चीज इन्तजार कर सकती है, मगर खेती नहीं।” सो उन्होंने पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू की मगर खेती पर राष्ट्रीय बजट में हिस्सा कम से कमतर होता गया। उनके बाद दूसरे प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा देकर किसानों की नीतियों को केन्द्र में लाने की कोशिश की। मगर अफसोस कि यह भी सिर्फ नारा ही बनकर रह गया। जो किसान कड़ी धूप, मूसलाधार बारिश-सूखे की मार सहकर भारत के 115 करोड़ लोगों को अन्न देते हैं, उन्हें कभी कोई राष्ट्रीय नागरिक सम्मान नहीं मिला। स्वतन्त्रता प्राप्ति के साढ़े छह दशकों के बावजूद जिन किसानों को अपने परिवार के सदस्यों से गैर-कृषि आय से सहायता नहीं मिलती, वे भारी मुसीबत में हैं। वे धीरे-धीरे किसान से भूमिहीन मजदूर बनने को अभिशप्त हैं। इनके लिए राष्ट्रीय कृषि नीति, 2002 घोषित की गई जिसमें कई खामियाँ थीं। अतः कृषि मन्त्रालय भारत सरकार के संकल्प दिनांक 18 नवम्बर, 2004 के द्वारा प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया। इसमें दो पूर्णकालिक सदस्यों के अलावा चार अंशकालिक सदस्य एवं एक सदस्य-सचिव थे। भारत में खेती और उस पर निर्भर किसानों की समस्याओं का सांगोपांग विश्लेषण राष्ट्रीय किसान आयोग की विभिन्न रिपोर्टों में किया गया है। अस्तु, भारत में खेती और किसानों की समस्याओं एवं उनके निराकरण के उपायों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

यहाँ सबसे पहले हम चर्चा करेंगे कि वर्तमान में भारत में खेती की क्या-क्या विशेषताएँ, समस्याएँ और खामियाँ मौजूद हैं। इसकी पहली विशेषता यह है कि कृषि एवं अनुषंगी उत्पादों में भारत का स्थान पूरे विश्व में दूसरा है। मगर कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में अब मात्र 16.6 प्रतिशत (2007) हिस्सा है जबकि सम्पूर्ण कार्यबल का 52 प्रतिशत कृषि में नियोजित है। इस प्रकार इसकी प्रति व्यक्ति एवं प्रति एकड़ उत्पादकता बहुत कम है। कई दशक पहले नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने एशियन ड्रामा नामक अपनी पुस्तक में कहा था कि भारतीय कृषि में ‘छद्म रोजगार’ होता है, क्योंकि जो काम एक व्यक्ति कर सकता है, उसे कई व्यक्ति करते हैं। इसकी दूसरी विशेषता है कि भारत कई कृषि उत्पादों के उत्पादन में पूरी दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक है जैसे— ताजे फल, जीरा, जूट, मटर, दालें, मसाले, ज्वार, तिल्ली, नीम्बू, दूध, मिर्च, काली मिर्च, अदरक, हल्दी, अमरूद, आम एवं गोश्त। इसकी तीसरी विशेषता है कि भारत में पालतू पशुओं की संख्या पूरी दुनिया में सर्वाधिक है। चौथे, काजू, गोभी, कपास बीज, लहसुन, रेशम, इलायची, प्याज, गेहूँ, चावल, गन्ना, मसूर, मूँगफली, चाय, आलू, लौकी, सीताफल एवं मछली उत्पादन में भारत का स्थान पूरी दुनिया में दूसरा है। पाँचवें, तम्बाकू, अलसी, नारियल, अण्डा और टमाटर उत्पादन में भारत का स्थान पूरी दुनिया में तीसरा है। छठवें, भारत विश्व के फल उत्पादन का दसवां हिस्सा उत्पादित करता है जिसमें आम, केला, पपीता आदि का प्रमुख स्थान है। सातवें, भारत के किसान अपनी-अपनी जमीन के स्वतन्त्र मालिक हैं और यह सदियों से पंचायती राज व्यवस्था लागू है। अर्थात किसान अब जमीन्दारों-जागीरदारों के अधीन नहीं हैं।

उल्लेखनीय है कि किसी उत्पादन के पाँच कारक होते हैं— भूमि, श्रम, पूँजी, उद्यमशीलता एवं संगठन। खेती के लिए भूमि सबसे महत्वपूर्ण कारक है। आबादी के बढ़ने के साथ-साथ खेतिहर जोतों का विभाजन तेजी से हुआ जिसके फलस्वरूप भारत की तीन-चौथाई जोतें एक हेक्टेयर से कम हैं। औसतन जोत का आकार बीस हजार वर्गमीटर से कम है। जोतों का आकार छोटा होने से कई प्रकार की तकनीकी का उपयोग असम्भव हो जाता है। भारत के छह लाख गाँवों में 72 प्रतिशत आबादी रहती है और नगरों-महानगरों-कस्बों में मात्र 28 प्रतिशत आबादी निवास करती है। मात्र 52.6 प्रतिशत (2003-04) खेती की सिंचाई सुनिश्चित हो पाती है। कहने का आशय यह है कि लगभग आधी खेती पूर्णतः वर्षा पर आधारित है। जो भूमि सिंचित दिखाई जाती है उसकी भी सिंचाई नलकूप के बिगड़ने, बिजली की आपूर्ति समय पर न होने, जल-वितरण में विषमता एवं अवैज्ञानिक होने, नाली टूटने, परस्पर असहयोग आदि के कारण सुनिश्चित नहीं होती।

वस्तुस्थिति यह है कि अधिकतर गाँवों में किसान वर्षा जल का समुचित संचयन नहीं करते क्योंकि दबंगों ने तालाबों का अस्तित्व ही मिटा दिया है और भू-जल का दोहन अत्यधिक होने के कारण जल-स्तर काफी नीचे चला गया है। अशिक्षा तथा विकल्प न होने के कारण प्रायः पूरे खेत को डुबोकर ही सिंचाई की जाती है, स्प्रिंकलर से नहीं। इस प्रकार जिस वर्ष अच्छी वर्षा होती है, उस वर्ष खेती की पैदावार अधिक होती है (उत्पादन और उत्पादकता दोनों मामले में)। उत्तर प्रदेश जैसे तमाम राज्यों ने नया सरकारी नलकूप नहीं गाड़ने का नीतिगत निर्णय ले लिया है, जिसके कारण सिंचाई की समस्या ज्यादा गम्भीर हो गई है। खेती राज्य सूची में है, यानी राज्य सरकारें ही इस पर नीतिगत निर्णय लेती हैं। भारत में कुल वर्षा का 75 प्रतिशत हिस्सा दक्षिण-पश्चिमी मानसून से होता हैं और जाहिर है कि भारत की कृषि व्यवस्था इन माहों में होने वाली वर्षा से जुड़ी होती है। भारत में मौसमी वर्षा का वितरण तालिका-1 में देखा जा सकता है।

तालिका-1: भारत में वर्षा का मौसमी वितरण

क्रम संख्या

मौसम

महीने

वितरण (प्रतिशत में)

1 मानसून के पूर्व मार्च-मई 10.4
2 दक्षिण-पश्चिमी मानसून जून-सितम्बर 73.4
3 मानसून के बाद अक्तूबर-दिसम्बर 13.3
4 जाड़े की वर्षा जनवरी-फरवरी 2.9

भारत में विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में वर्षापात भिन्न-भिन्न होता है और 68-70 प्रतिशत क्षेत्र (2.29 करोड़ हेक्टेयर) सूखा सुभेद्य यानी दुर्बल क्षेत्र है। इसमें 33 प्रतिशत क्षेत्र विशेष रूप से सूखाग्रस्त है जहाँ 750 मि.मी. से कम वर्षा होती है। इसके अलावा 35 प्रतिशत क्षेत्र भी सूखा से प्रभावित होता है जहाँ 750 से 1,125 मि.मी. वर्षा होती है। सूखाग्रस्त क्षेत्र मुख्यतः प्रायद्वीपीय और पश्चिमी भारत के शुष्क, अर्ध् -शुष्क एवं उप-नम क्षेत्र हैं। विभिन्न बुआई श्रेणियों के वर्षापात वाले क्षेत्रों का विवरण तालिका-2 में देखा जा सकता है।

तालिका-2
क्रम संख्या वर्षा की श्रेणियाँ  प्रकार बुआई-क्षेत्र (प्रतिशत में)
1 750 मि.मी. से कम कम वर्षापात 33
2 750 से 1125 मि.मी. मध्यम वर्षापात 35
3 1126 से 2000 मि.मी. अधिक वर्षापात 24
4 2000 मि.मी. से ऊपर अत्यधिक वर्षापात 08

भारत के विभिन्न राज्यों को वर्षा की मात्रा के हिसाब से चार क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है :

1. शुष्क क्षेत्र (19.6 प्रतिशत)— जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 100-400 मि.मी. होती है जिसके कारण साल भर पानी की कमी रहती है। इसमें राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के कुछ जिले शामिल हैं।

2. अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र (37 प्रतिशत)— जहाँ कुछ महीनों में पानी का आधिक्य होता है तो कुछ महीनों में कमी होती है। यहाँ 400-600 मि.मी. औसत वार्षिक वर्षापात होता है। इसमें हरियाणा के कुछ जिले, पंजाब, पश्चिमी उत्तर-प्रदेश, पश्चिमी मध्य प्रदेश एवं पश्चिमी घाटों के कुछ क्षेत्र शामिल हैं। यहाँ मध्यम से तीव्र सूखा पड़ता है।

3. उप-नम क्षेत्र (21 प्रतिशत)— जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 600-900 मि.मी. होती है— उत्तरी मैदानी क्षेत्र के कुछ भाग, केन्द्रीय ऊपरी भूमि, पूर्वी पठार, पूर्वी घाटों के कुछ भाग, पश्चिमी हिमालय के कुछ हिस्से। यहाँ सूखा मध्यम स्तर का होता है।

4. नम क्षेत्र— असम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र जहाँ पर्याप्त वर्षा होती है यानी सूखा प्रायः नहीं पड़ता।

सूखे की औसत स्थिति देखने के बाद उचित होगा कि हम विभिन्न राज्यों के विभिन्न जिलों को भी जान लें जहाँ अक्सर सूखा पड़ता है। इसे तालिका-3 में देख सकते हैं।

तालिका-3
राज्य जिले
आन्ध्र प्रदेश अनन्तपुर, चित्तूर, कडप्पा, हैदराबाद, कुर्नूल, महबूबनगर, नलगोण्डा,प्रकाशम।
बिहार मुँगेर, नवादा, रोहतास, भोजपुर, औरंगाबाद, गया।
गुजरात अहमदाबाद, अमरेली, बनासकाठा, भावनगर, भरूच, जामनगर, खेड़ा,कच्छ, मेहसाणा, पंचमहल, राजकोट, सुरेंद्रनगर।
हरियाणा भिवाड़ी, गुड़गाँव, महेंद्रगढ़, रोहतक।
जम्मू-कश्मीर डोडा, ऊधमनगर।
कर्नाटक बंगलुरु, बेलगाम, बेल्लारी, बीजापुर, चित्रादुर्गा, चिकमगलूर, धारवाड़,गुलबर्ग, हासन, कोलार, मांड्या, मैसूर, रायचूर, तुमकुर।
मध्य प्रदेश बेतुल, दतिया, देवास, धार, झाबुआ, खंडवा, शहडोल, शाजापुर, सीधी,उज्जैन।
महाराष्ट्र अहमदनगर, औरंगाबाद, बीड, नांदेड़, उस्मानाबाद, पुणे, परभणी, सांगली,सतारा, शोलापुर।
ओडिशा फुलबनी, कालाहाण्डी, बोलागीर, केन्द्रपाड़ा।
राजस्थान अजमेर, बांसवाड़ा, बाड़मेर, चुरू, डूंगरपुर, जालौर, झुंझनू, जोधपुर,नागपुर, पाली, उदयपुर।
तमिलनाडु कोयम्बटूर धर्मापुरी, मदुरई, रामनाथपुरम्, सलेम, तिरुचिरापल्ली,तिरुनेलवेल्ली, कन्याकुमारी।
उत्तर प्रदेश इलाहाबाद, बान्दा, हमीरपुर, जालौन, मिर्जापुर, बनारस।
पश्चिम बंगाल बांकुड़ा, मिदनापुर, पुरुलिया।
झारखंड पलामू।

स्पष्ट है कि प्रायः एक ही समय में भारत के विभिन्न स्थानों पर अतिवृष्टि या सूखा पड़ता है। बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य प्रायः दोनों से आक्रान्त रहते हैं। सूखा या बाढ़ के चलते खेती नहीं हो पाती। उत्तरी बिहार में बाढ़ को ‘तीसरी फसल’ माना जाता है। हर वर्ष तमाम लोग, नेतागण, अधिकारीगण, ठेकेदार, इंजीनियर आदि बाढ़ का बेसब्री से इन्तजार करते हैं, क्योंकि आपदा प्रबन्धक राहत का बन्दोबस्त करते हैं जिसे हड़पने के लिए तमाम व्यक्ति, समूह, संगठन और राजनीतिक दल पूरी तैयारी करते हैं।

ऐसा भी देखा गया है कि ठेकेदार और इंजीनियर मिलकर प्रायः बाँध तोड़ देते हैं जिससे उनकी मरम्मत के नाम पर अच्छी-खासी रकम मिले तथा बाढ़ राहत अलग से मिले। यह भी सच है कि नदियों से बाढ़ के दौरान प्रायः उपजाऊ मिट्टी खेतों में आ जाती है जिसके कारण रबी की पैदावार ज्यादा होती है।

यह तथ्य विशेषकर उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद भारत के अधिकतर किसान गरीब हैं, वे अपने बच्चों को समुचित शिक्षा नहीं दे पाते, परिवार के बीमार सदस्यों का इलाज नहीं करा पाते, उन्हें पीने का पानी एवं शौचालय जैसी अनेक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। छोटे-छोटे किसान हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद बहुत कम आय अर्जित करते हैं क्योंकि उनके उत्पादों की सही कीमत उन्हें नहीं मिलती। किसी मजबूरी में उन्हें औने-पौने दाम पर अपने अनाज, दलहन, तिलहन आदि बेचने पड़ते हैं और अन्ततः लागत की महंगी चीजों, यथा— शोधित बीज, सिंचाई, कीटनाशक, उर्वरक, खरपतवारनाशक, मजदूरी आदि के लिए कर्ज लेना पड़ता है। जुताई, ढुलाई, सिंचाई, मड़ाई आदि के लिए प्रयुक्त मशीन/गाड़ियाँ डीजल से चलती हैं जिसकी कीमत साल में प्रायः दो बार बढ़ जाती है। ट्रैक्टर से जुताई के लिए एक सौ रुपए प्रति घण्टा की दर प्रचलित है और सिंचाई के लिए तीन से चार रुपए प्रति घण्टा की दर प्रचलित है। फिर मजदूरी एक सौ रुपए प्रतिदिन है जिसे वहन करने में किसानों की रीढ़ टूट जा रही है। सरकारी और अर्द्ध सरकारी या सहकारी संस्थाओं से उन्हें कृषि ऋण पर्याप्त मात्रा में, समय पर और आसानी से नहीं मिल पाता, अतः वे सूदखोरों/महाजनों से ऊँची ब्याजदरों पर कर्ज लेते हैं जो 2 प्रतिशत तक होता है। कुल कृषि ऋण का लगभग आधा महाजनों से लेना पड़ता है क्योंकि बैंकों, सहकारी समितियों आदि में ऋण स्वीकृत करने की प्रक्रिया जटिल और लम्बी है, खासकर अनुदान की सारी राशि बैंक, ब्लॉक, ग्रामसेवक, दलाल आदि हजम कर जाते हैं। प्रेमचन्द की ‘सवा सेर गेहूँ’ नामक कहानी में घटित सूदखोरी की प्रथा अब भी चरितार्थ हो रही है।

महाराष्ट्र में 55 प्रतिशत से अधिक किसान कृषि ऋण में डूबे हुए हैं और प्रायः सूखा पड़ने के कारण और सुनिश्चित सिंचाई व्यवस्था न होने के कारण वे भारी नुकसान उठाते हैं और लिया गया कर्ज अदा नहीं कर पाते। कई लघु वित्त संस्थाओं ने बड़े उत्साह से महाजनों की जगह ले ली परन्तु उनकी भी ब्याज दरें काफी ऊँची हैं और वे वसूली में वैसे ही प्रताड़नात्मक हथकण्डे अपनाते हैं जैसे सूदखोर अपनाते रहे हैं। अतः किसानों की आत्महत्या के लिए वे भी जिम्मेदार हैं। भारत सरकार इस दिशा में ब्याज दरों की अधिकतम सीमा निर्धारित करने हेतु एक कानून बना रही है। वास्तव में, विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत के अधिकतर किसान ऋणग्रस्तता में जन्म लेते हैं और उसी में मर जाते हैं।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के अनुसार वर्ष 2003 में भारत में प्रति किसान परिवार की औसत आय रु. 2,115 थी और कई राज्यों में यह औसत उससे भी कम थी। जैसे— ओडिशा में मात्र रु. 1,062 और उत्तर प्रदेश में मात्र रु. 1,633 है। यह भी पाया गया कि गहन कुपोषण भूमिहीन तथा सीमान्त/लघु किसानों (जिन्हें सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है) में काफी अधिक है। पूरे देश में 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यह कैसी विडम्बना है कि भारत के शहरी-औद्योगिक क्षेत्रों में अधुनातन तकनीकी एवं उपकरण उपलब्ध हैं जबकि गाँवों में बिजली, पानी, सड़क, विद्यालय, अस्पताल आदि या तो उपलब्ध नहीं हैं अथवा उनकी स्थिति सन्तोषजनक नहीं है। यह रेखांकित करने योग्य है कि फसल बीमा मुश्किल से 14 प्रतिशत किसानों का हुआ है जबकि कई कारणों से (ज्यादातर प्राकृतिक) हर साल काफी फसलों का नुकसान होता है। कई फसलों की बर्बादी अभी भी चूहों, कीटों आदि से होती है। फिर कटाई करके घर तक लाने में भी नुकसान होता है। विशेषकर फलों और सब्जियों का तीस फीसदी तक नुकसान होता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य सभी फसलों के लिए नहीं है और जो घोषित होता है, वह भी दुर्भाग्यवश उत्पादन की लागत से कम होता है। भारत किसान यूनियन तथा नागरिक समाज के अन्य संगठनों ने बार-बार आवाज उठाई है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने में किसानों का समुचित प्रतिनिधित्व हो तथा उसमें वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए जो उत्पादन की लागत के सूचकांक से सीधे जुड़ी हो।

यह बात भी ज्ञातव्य है कि रासायनिक उर्वरकों, विदेशी बीजों, रासायनिक कीटनाशकों और ज्यादा सिंचाई के कारण मिट्टी की गुणवत्ता खराब हुई है। उसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हुई है या खारापन आ गया है। इस दिशा में कृषि वैज्ञानिकों ने अपेक्षित शोध नहीं किया है और जो भी किया है, वह किसानों तक नहीं पहुँचा है। आजकल कृषि-विस्तार का काम कृषि विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र और सरकारी कर्मचारी (ग्रामसेवक/जनसेवक से लेकर जिला कृषि अधिकारी तक) समुचित रूप से और बार-बार नहीं करते जिससे कई नयी उपयोगी चीजें प्रयोगशाला से खेत तक नहीं पहुँच पातीं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने टर्मिनेटर बीजों, रासायनिक उर्वरकों एवं अनुबन्ध खेती को बढ़ावा दिया है जिससे सदियों पुराने देशज बीज गायब हो गए और विदेशी महंगे बीज एक बार ही बोए जा सकते हैं। उन्हें आगे बीज के रूप में उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इस प्रकार किसानों की स्वायत्तता खत्म हो गई है। ऐसे माहौल में जब खेती घाटे का सौदा बन गई है, 40 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण)। कुछ तो नीतिगत कमियाँ हैं और कुछ नीतियों एवं कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में कमियाँ हैं और दोनों के शिकार भारत के अधिकतर किसान हैं। ऐसे परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय किसान आयोग ने कई महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ की हैं जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं :

1. सर्वप्रथम राष्ट्रीय भूमि उपयोग सलाहकार सेवा बनाई जाए जो राज्य तथा ब्लॉक स्तरीय भूमि उपयोग सलाहकार सेवा से जुड़ी हो। मिट्टी के स्वास्थ्य की परख की जाए और पूरे देश में 1,000 आधुनिक मिट्टी जाँच प्रयोगशालाएँ गठित की जाएँ। हर किसान को मिट्टी स्वास्थ्य वही दी जाए जिसमें मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं सूक्ष्म जैविक तत्वों का समेकित विश्लेषण हो। एक ओर घुमन्तू गोष्ठियों का कार्यक्रम हो, तो दूसरी ओर खेती विद्यालयों (सफल किसानों के खेतों में) से किसान सीख को बढ़ावा दिया जाए।

2. कृषि हेतु समुचित जल नीति बनाई जाए। कुओं और तालाबों की उड़ाही/जीर्णोद्धार किया जाए। जल साक्षरता आन्दोलन चलाया जाए तथा प्रत्येक पंचायत में जल शिक्षक हों, राष्ट्रीय मत्स्य-पालन विकास बोर्ड गठित हो।

3. समेकित परिवार बीमा नीति सभी ग्रामीण गरीबों के लिए बनाई जाए तथा ग्रामीण बीमा विकास कोष स्थापित किया जाए। ग्रामीणों/किसानों की बढ़ती ऋणग्रस्तता के आलोक में सरकार किसानों को मात्र 4 प्रतिशत ब्याजदर पर कर्ज दे। ‘लघु वित्त’ की जगह ‘आजीविका वित्त’ की जरूरत है जिसमें वित्तीय सेवाएँ (जीवन, स्वास्थ्य, फसल एवं पशुओं का बीमा हो, सड़क, बिजली, बाजार, दूरसंचार आदि के लिए आधारभूत वित्त हो), कृषि एवं व्यवसाय विकास सेवाएँ (उत्पादकता वृद्धि, स्थानीय मूल्य संवर्द्धन, वैकल्पिक बाजार जुड़ाव) एवं सांस्थानिक विकास सेवाएँ (उत्पादकों का संगठन यथा— स्व-सहायता समूह, जल उपयोगक संघ, वन संरक्षण समिति, साख एवं उत्पाद सहकारी समितियाँ, पचायतों का सशक्तीकरण आदि) जहाँ बार-बार सूखा या बाढ़ आती हो, वहाँ कृषि जोखिम निधि की स्थापना की जाएँ। महिला किसानों को किसान साखपत्र दिए जाए। किसानों को मजबूरी में अपने उत्पादों को सस्ती दर पर न बेचना पड़े, इसके लिए उन्हें बन्धक ऋण दिए जाने की व्यवस्था की जाए। ऋणग्रस्त किसानों को ऋण से बाहर निकलने की सुविधा दी जाए और साख सलाह केन्द्र गठित हों।

4. भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद तथा सभी कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा कृषि तकनीकी वर्ष मनाया जाए और सहभागी शोध को बढ़ावा दिया जाए। वे साठ हजार प्रयोगशाला से खेत तक कार्यक्रम कटाई के बाद की तकनीकी, प्राथमिक उत्पादों तथा जैवमात्रा उपयोगिता में मूल्य संवर्द्धन क्षेत्र में आयोजित करें। कृषि वैज्ञानिक नये बीजों और तकनीकी की उपलब्धि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता के साथ-साथ प्रति हेक्टेयर शुद्ध आय के रूप में भी देखें। कृषि तकनीकी मिशनों का राष्ट्रीय महासंघ गठित हो जिसका अध्यक्ष सफल किसान हो जो विभिन्न मिशनों (दलहन, तिलहन, कपास, बागवानी) के लाभों को समूचे किसान समुदाय तक पहुँचा सके।

5. आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा राज्य कृषि उत्पाद बाजार समिति अधिनियम आदि में निजी पूँजी निवेश एवं आधुनिक कृषि के आलोक में (कृषि उत्पादों को रखने, बाजार में बेचने और प्रसंस्करण करने हेतु) संशोधन किए जाएँ। ग्रामीण हाटों को बेहतर बनाया जाए। इसके अलावा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों/प्रसंस्करण कम्पनियों और किसानों के बीच ‘ठेका खेती’ के बारे में एक विस्तृत, स्वच्छ, समतामूलक तथा किसान-केन्द्रित मॉडल करार तैयार किया जाए जिसमें गुणवत्ता के मापदण्ड, कीमत के मापदण्ड, भुगतान की शर्तें, प्राकृतिक आपदा सम्बन्धी प्रावधान, समझौता तोड़ने की दशाएँ आदि सुस्पष्ट हों। इसके अलावा भारत का पशुधन चारा निगम गठित हो तो उन स्थानीय स्व-सहायता समूहों को समर्थन दे जो चारा उत्पादन से जुड़े हों। इसके साथ ही जैविक खेती प्रक्षेत्रों की पहचान हो। फिर कृषि उत्पादन के लिए भारतीय एकल बाजार विकसित किए जाए जिससे छोटे-छोटे किसानों को बल मिले।

6. खाद्य एवं पोषाहार सुरक्षा हेतु मध्यमकालिक रणनीति बनाई जाए जिसमें निम्न छह-सूत्री कार्य योजना भूख-मुक्त भारत के लिए हो :

— खाद्य एवं पोषाहार सुरक्षा हेतु जीवन-चक्र दृष्टिकोण पर आधारित वितरण-व्यवस्था हो;
— सामुदायिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था- जीन, बीज, अनाज एवं जल बैंक की निरन्तरता हो। सामुदायिक खाद्य बैंक का गठन शीघ्र हो;
— छिपी भूख की समाप्ति हेतु प्राकृतिक एवं खाद्य पुष्टिकरण की व्यवस्था हो;
— स्वरोजगार वालों के लिए नयी रणनीति हो— स्व-सहायता समूहों का क्षमता-निर्माण एवं अनुश्रवण केन्द्र, लघु वित्त से आजीविका वित्त का प्रतिमान बदलाव हो;
— बाजारण योग्य बचत बढ़ाने हेतु छोटी जोतों की उत्पादकता एवं लाभ को बढ़ावा दिया जाए;
— राष्ट्रीय खाद्य गारण्टी अधिनियम बने जिसमें नरेगा और काम के लिए भोजन कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएँ शामिल की जाएँ (इसके आलोक में भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पेश किया गया है जिसके अनुसार गरीबों को न्यूनतम दर पर हर महीने खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाएगा)।

7. खेती में लगी महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु संयुक्त पट्टा (पति एवं पत्नी के नाम) निर्गत किया जाए। हर राज्य में कम से कम 40 प्रतिशत अनुसूचित जातियों/जनजातियों की महिलाओं को पट्टे दिए जाएँ। बीज-उत्पादन, फलदार वृक्षारोपण तथा औषधि वृक्षों के रोपण में लगी महिलाओं को जमीन आवँटित की जाए। इसके अलावा ग्राम पंचायत महिला निधि की स्थापना की जाए जिससे स्व-सहायता समूह एवं महिलाओं के संघ सामुदायिक कार्यकलाप शुरू कर सकें जिनसे खास लैंगिक जरूरतें पूरी हो सकें।

8. कृषि मन्त्रालय का नाम कृषि एवं किसान कल्याण मन्त्रालय होना चाहिए तथा एक अलग मत्स्य-पालन विभाग गठित हो। इसके साथ ही पशुधन विरासत के संरक्षण हेतु विरासत जीन बैंक का गठन हो। पोषाहार केन्द्रित कृषि व्यवस्था का संवर्ध्सन आवश्यक है तथा मर रही फसलों एवं मर रहे देशज विवेक को बचाया जाए। जैव सुरक्षा जैसी सम्पूर्ण अवधारणा का कार्यान्वयन किया जाए जिसमें कृषि का टिकाऊपन, खाद्य सुरक्षा तथा पर्यावरण का संरक्षण शामिल हो।

यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि कई बहुराष्ट्रीय बीज-उत्पादक कम्पनियाँ (यथा मोनसेण्टो) तथा कुछ देशी बीज उत्पादक कम्पनियाँ बीज अधिनियम, 1966 की निम्नलिखित कमियों का नाजायज फायदा उठा रही हैं :

1. बीजों के प्रभेदों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है।
2. बीजों के प्रभेद, जो भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् द्वारा अधिसूचित नहीं होते, इसमें शामिल नहीं हैं।
3. इसमें वाणिज्यिक फसलें एवं रोपण (बागान) फसलें शामिल नहीं हैं।
4. बीजों का प्रमाणन सिर्फ राज्य सरकारों की एजेंसियों द्वारा होता है
5. ट्रांसजेनिक पदार्थों के विनियमन हेतु कोई प्रावधान नहीं।
6. उल्लंघन होने पर मामूली दण्ड होना— जैसे, नकली बीज बेचने/उत्पादित करने वालों को सिर्फ पाँच सौ रुपये जुर्माना का प्राववधान है।

पुराने कानून में आमूल परिवर्तन हेतु बीज (संशोधन) विधेयक, 2010 संसद में है जिस पर कई सांसदों और नागरिक संगठनों ने माँग की है कि बीजों के दाम के बारे में स्पष्ट प्रावधान हो जिससे किसानों को उचित मूल्य पर बीज उपलब्ध हों, न कि वे तथाकथित ‘बाजार की शक्तियों’ से निर्धारित हों। अभी बीज उत्पादन करने वाले निगम नये बीजों का दाम बीस-पच्चीस गुना अधिक रखते हैं। जब से भारत ने विश्व व्यापार संगठन कृषि समझौते पर हस्ताक्षर किया, तब से किसानों को अधिक कीमत देने पर मजबूर होना पड़ा है। इस विधेयक में यह संशोधन भी प्रस्तावित है कि जो व्यक्ति, समूह या कम्पनी गलत प्रतिनिधित्व करे या तथ्यों को छिपाए अथवा उनके बीजों में खामियाँ हों, उन्हें एक लाख रुपए जुर्माना और एक साल की कैद की सजा हो। दूसरे, उस कम्पनी का पंजीकरण रद्द कर दिया जाए, जिससे बीजों के प्रमाणन की प्रति और सावधिक रिटर्न कम्पनियों द्वारा राज्य सरकारों को दिया जाए। चौथे, नकली एवं घटिया बीजों के उत्पादन, बिक्री आदि पर नियन्त्रण हो तथा बीजों के उत्पादन-वितरण आदि में निजी क्षेत्र की भागीदारी हो और बीजों व रोपण पदार्थों के आयात को अधिक उदार बनाया जाए। पाँचवें, कोई ट्रांसजेनिक बीज-प्रभेद तब तक पंजीकृत नहीं किया जाएगा जब तक उसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के तहत स्वीकृति न मिली हो। ऐसे बीजों पर लेबल होगा और वे विशिष्ट मापदण्डों के अनुरूप होंगे।

ज्ञातव्य है कि 2001 में संसद ने पौधा विविधता संरक्षण एवं किसानों के अधिकार अधिनियम को पारित किया था जो किसानों के हितसाधन हेतु अद्वितीय कानून माना गया क्योंकि इस कानून के द्वारा किसानों को पूर्व की भाँति बीज बचाने, बोने और बेचने का अधिकार दिया गया, भले बीज संरक्षित प्रभेदों के हों। इस प्रकार किसानों का पुराना अधिकार बरकरार रखा गया अन्यथा विश्व व्यापार संगठन के कृषि समझौते के तहत ‘ट्रिप्स’ ने उन्हें ऐसे अधिकार से वंचित कर दिया था। यद्यपि विश्व बैंक जैसी उदारवादी संस्थाएँ भारत पर दबाव डालता रही हैं कि किसानों को कृषि पर अनुदान (बिजली, बीज, उपकरण, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक आदि) खत्म किया जाए, मगर छोटे और सीमान्त किसानों (जिनकी संख्या 90 प्रतिशत है) को ये अनुदान जारी रहने जरूरी हैं क्योंकि किसानों को उत्पादन-लागत के रूप में काफी खर्च करना पड़ता है जबकि बाजार में उन्हें अपने उत्पादों का सही मूल्य समय पर नहीं मिलता। दूसरी ओर किसानों को शहरी एवं औद्योगिक उत्पादों को महंगी दर पर खरीदना पड़ता है। किसानों के सर्वांगीण विकास हेतु इस विषमता को दुरुस्त करने की नितान्त जरूरत है। इसके लिए प्रबल इच्छा शक्ति एवं संवेदना की विशेष जरूरत है। यह दोहराने की जरूरत नहीं कि सार्वजनिक निवेश में वृद्धि करने से ही कृषि में निजी निवेश बढ़ सकेगा। परन्तु दुर्भाग्यवश कृषि में सार्वजनिक निवेश घट रहा है जिसके कारण किसानों की दुर्गति हो रही है।

Source:  योजना, जनवरी 2011