रामदेवर मंदिर
17
Aug

पाकिस्तानी मुस्लिमो ने भी पूजा था भारत के इस लोकदेवता को

भारत के राजस्थान में अनेक ऐसे महापुरूष हुए जिन्होंने मानव देह धारण कर अपने कर्म और तप से यहां के लोक जीवन को आलोकित किया.उनके चरित्र, कर्म और वचनबद्धता से उन्हें जनमानस में लोकदेवता की पदवी मिली और वे जन-जन में पूजे जाने लगे। ऐसे ही लोकदेवताओं में बाबा रामदेव जिनका प्रमुख मंदिर जैसलमेर जिले के रामदेवरा में है। सद्भावना की जीती जागती मिसाल हिन्दू समाज में वे ”बाबा रामदेव“ एवं मुस्लिम समाज ”रामसा पीर“ के नाम से पूजनीय हुए। रामदेव जी के जन्म स्थान को लेकर मतभेद है परन्तु इसमें सब एक मत है कि उनका समाधी स्थल रामदेवरा ही है। यहां वे मूर्ति स्वरूप में पूजे जाते हैं रामदेवरा में उन्होंने जीवित समाधी ली थी और यहीं पर उनका भव्य मंदिर बना हुआ है पूर्व में समाधी छोटे छतरीनुमा मंदिर में बनी थी वर्ष 1912 में बीकानेर के तत्कालीन शासक महाराजा गंगासिंह ने छतरी के चारों तरफ बडे़ मंदिर का निर्माण कराया, जिसने धीरे-धीरे भव्य मंदिर का रूप ले लिया बाबा की समाधी के सामने पूर्वी कोने में अखण्ड ज्योति प्रज्जवलित रहती है दर्शन द्वार पर लोहे का चैनल गेट लगाया गया है दर्शनार्थी अपनी मनौती पूर्ण करने के लिए कपड़ा, मौली, नारियल आदि बांधते हैं तथा मनौती पूर्ण होने पर खोल देते हैं। बताया जाता है कि उस समय मंदिर के निर्माण में 57 हजार रूपये की लागत आई थी यह मंदिर हिन्दुओं एवं मुसलमानों दोनों की आस्था का प्रबल केेन्द्र है।

मुस्लिम पीरो ने ली थी परीक्षा

बाबा रामदेव जी के 24 परचों में पंच पीपली भी प्रसिद्ध स्थल है इस सम्बंध में प्रचलित कथानक के अनुसार रामदेव जी की परीक्षा के लिए मक्का-मदीना से पांच पीर रामदेवरा आये और उनके अतिथी बने भोजन के समय पीरों ने कहा कि वे स्वयं के कटोरे में ही भोजन करते हैैं रामदेव ने वहीं बैठेे -बैठे अपनी दाई भुजा को इतना लम्बा फैलाया कि मदीना से उनके कटोरे वहीं मंगवा दिये पीरों ने उनका चमत्कार देखकर उन्हें अपना गुरू अर्थात पीर माना और यहीं से रामदेव जी का नाम रामसा पीर पड़ा और बाबा को पीरो के पीर रामसा पीर की उपाधी भी प्रदान की गई इस घटना से मुसलमान इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी इनकी पूजा करना शुरू कर दिया। रामदेवरा से पूर्व की ओर 10 किलोमीटर एकां गांव के पास छोटी सी नाडी के पाल पर घटित इस घटना के दौरान पीरों ने भी परचे स्वरूप पांच पीपली लगाई थी जो आज भी मौजूद हैं यहां बाबा रामदेव का एक छोटा सा मंदिर व सरोवर भी बना है मंदिर में पुजारी द्वारा नियमित पूजा की जाती है।

यह किया चमत्कार

रामदेवरा मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पूर्व में निर्मित रूणीचा कुंआ और एक छोटा रामदेव मंदिर भी दर्शनीय है। बताया जाता है कि रानी नेतलदे को प्यास लगने पर रामदेव जी ने भाले की नोक से इस जगह पाताल तोड कर पानी निकाला था और तब ही से यह स्थल राणीसा का कुंआ के नाम से जाना गया कालान्तर में अपभ्रंश होते-होते रूणीचा कुंआ में परिवर्तित हो गया जिस पेड़ के नीचे रामदेव जी को डाली बाई मिली थी, उस पेड़ को डाली बाई का जाल कहा जाता है।

दलितों को दिलवाया सम्मान

रामदेवजी ने तत्कालीन समाज में व्याप्त छूआछूत, जात-पांत का भेदभाव दूर करने तथा नारी व दलित उत्थान के लिए प्रयास किये। अमर कोट के राजा दलपत सोढा की अपंग कन्या नेतलदे को पत्नी स्वीकार कर समाज के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया दलितों को आत्मनिर्भर बनने और सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पाखण्ड व आडम्बर का विरोध किया उन्होंने सगुण-निर्गुण, अद्वैत, वेदान्त, भक्ति, ज्ञान योग, कर्मयोग जैसे विषयों की सहज व सरल व्याख्या की आज भी बाबा की वाणी को हरजस के रूप में गाया जाता है। वर्ष में दो बार रामदेवरा में भव्य मेलों का आयोजन किया जाता है । शुक्ल पक्ष में तथा भादवा और माघ में दूज से लेकर दशमीं तक मेला भरता है । भादवा के महिने में राजस्थान के किसी सड़क मार्ग पर निकल जाये, सफेद रंग की या पचरंगी ध्वजा को हाथ में लेकर सैंकडों जत्थे रामदेवरा की ओर जाते नजर आते हैं। इन जत्थों में सभी आयु वर्ग के नौजवान, बुजुर्ग, स्त्री-पुरूष और बच्चें पूरे उत्साह से बिना थके अनवरत चलते रहते हैं।  बाबा रामदेव के जयकारे गुंजायमान करते हुए यह जत्थे मीलों लम्बी यात्रा कर बाबा के दरबार में हाजरी लगाते हैं।

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