लाल लाजपत राय
03
Apr

लाला लाजपत राय

आरम्भिक जीवन:-
लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को धुडिके ग्राम में (मोगा जिला, पंजाब) हुआ। उनके पिता धर्म से अग्रवाल थे। 1870 के अंत और 1880 के प्रारंभ में, जहा उनके पिता एक उर्दू शिक्षक थे तभी राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रेवारी (तब का पंजाब, अभी का हरयाणा) के सरकारी उच्च माध्यमिक स्कूल से ग्रहण की। राय हिंदुत्वता से बहोत प्रेरित थे, और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राजनीती में जाने की सोची। (जब वे लाहौर में कानून की पढाई कर रहे थे तभी से वे हिंदुत्वता का अभ्यास भी कर रहे थे। उनके इस बात पर बहोत भरोसा था की हिंदुत्वता ये राष्ट्र से भी बढ़कर है। वे भारत को एक पूर्ण हिंदु राष्ट्र बनाना चाहते थे)। हिंदुत्वता, जिसपे वे भरोसा करते थे, उसके माध्यम से वे भारत में शांति बनाये रखना चाहते थे और मानवता को बढ़ाना चाहते थे। ताकि भारत में लोग आसानी से एक-दुसरे की मदद करते हुए एक-दुसरे पर भरोसा कर सके। क्यूकी उस समय भारतीय हिंदु समाज में भेदभाव, उच्च-नीच जैसी कई कु-प्रथाए फैली हुई थी, लाला लाजपत राय इन प्रथाओ की प्रणाली को ही बदलना चाहते थे। अंत में उनका अभ्यास सफल रहा और वे भारत में एक अहिंसक शांति अभियान बनाने इ सफल रहे और भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए ये बहोत जरुरी था। वे आर्य समाज के भक्त और आर्य राजपत्र (जब वे विद्यार्थी थे तब उन्होंने इसकी स्थापना की थी) के संपादक भी थे।

राजनीतिक जीवन:-
लाला लाजपत राय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन प्रमुख हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। वह लाल-बाल-पाल की तिकड़ी का हिस्सा थे। बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पाल इस तिकड़ी के दूसरे दो सदस्य थे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नरम दल (जिसका नेतृत्व पहले गोपाल कृष्ण गोखले ने किया) का विरोध करने के लिए गरम दल का गठन किया। लालाजी ने बंगाल के विभाजन के खिलाफ हो रहे आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्होंने सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी, बिपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष के साथ मिलकर स्वदेशी के सशक्त अभियान के लिए बंगाल और देश के दूसरे हिस्से में लोगों को एकजुट किया। लाला लाजपत राय को 3 मई 1907 को रावलपिंडी में अशांति पैदा करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और मांडले जेल में छः महीने रखने के बाद 11 नवम्बर 1907 को रिहा कर दिया गया।

स्वतंत्रता संग्राम ने एक क्रन्तिकारी मोड़ ले लिया था इसलिए लालाजीका चाहते थे की भारत की वास्तविक परिस्थिति का प्रचार दोसरे देशों में भी किया जाये। इस उद्देश्य से 1914 में वह ब्रिटेन गए। इसी समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया जिसके कारण वह भारत नहीं लौट पाये और फिर भारत के लिए समर्थन प्राप्त करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। उन्होंने इंडियन होम लीग ऑफ़ अमेरिका की स्थापना की और “यंग इंडिया” नामक एक पुस्तक लिखी। पुस्तक के द्वारा उन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन को लेकर गंभीर आरोप लगाये और इसलिए इसे ब्रिटेन और भारत में प्रकाशित होने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया। 1920 में विश्व युद्ध खत्म होने के बाद ही वह भारत लौट पाये।

1924 में लालाजी कांग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गये और ‘केन्द्रीय धारा सभा के सदस्य चुन लिए गये। जब उनका पण्डित मोतीलाल नेहरू से राजनैतिक मतभेद हो गया तो उन्होंने ‘नेशनलिस्ट पार्टी’ का गठन किया और पुनः असेम्बली में पहुँच गये।
अन्य विचारशील नेताओं की भाँति लालाजी भी कांग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढ़ने वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने ‘हिन्दू महासभा’ के कार्य को आगे बढ़ाया।

1925 में उन्हें ‘हिन्दू महासभा’ के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया.  सन 1912 में लाला लाजपत राय ने एक ‘अछूत कॉन्फ्रेंस’ आयोजित की थी, जिसका उद्देश्य हरिजनों के उद्धार के लिये ठोस कार्य करना था। उन्हीं के प्रयासों से 1926 ई. में ‘श्रमिक संघ अधिनियम’ पारित किया गया। उन्होंने ‘तरुण भारत’ नामक पुस्तक लिखी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। उन्होंने ‘यंग इंण्डिया’ नामक मासिक पत्र भी निकाला। इसी दौरान उन्होंने ‘भारत का इंग्लैंड पर ऋण’, ‘भारत के लिए आत्मनिर्णय’ आदि पुस्तकें लिखीं। लालाजी परदेश में रहकर भी अपने देश और देशवासियों के उत्थान के लिए काम करते रहे थे। अपने चार वर्ष के प्रवास काल में उन्होंने ‘इंडियन इन्फ़ॉर्मेशन’ और ‘इंडियन होमरूल’ दो संस्थाएं सक्रियता से चलाईं। 1920 में उन्होंने पंजाब में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण उन्हें 1921 में जेल हुई। उनके नेतृत्व में यह आंदोलन पंजाब में जंगल की आग की तरह फैल गया और जल्द ही वे ‘पंजाब का शेर’ या ‘पंजाब केसरी’ जैसे नामों से पुकारे जाने लगे।

लाला जी की मृत्यु से सारा देश उत्तेजित हो उठा और चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव व अन्य क्रांतिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने का निर्णय किया। इन जाँबाज देशभक्तों ने लालाजी की मौत के ठीक एक महीने बाद अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और 17 दिसम्बर 1928 को ब्रिटिश पुलिस के अफ़सर सांडर्स को गोली से उड़ा दिया। लालाजी की मौत के बदले सांडर्स की हत्या के मामले में ही राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फाँसी की सज़ा सुनाई गई।

लाला लाजपत राय का हमेशा से यही मानना था की, “मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है न की दुसरो की कृपा से।”

इसलिए हमें हमेशा अपने आप पर भरोसा होना चाहए, अगर हम में कोई काम करने की काबिलियत है तो निच्छित ही वह काम हम सही तरीके से कर पाएंगे. कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसे शुरू करना बहोत जरुरी होता है। जिस समय लाला लाजपत राय स्वतंत्रता अभियान में शामिल हुए उस समय उन्हें ये पता भी नहीं था के वे सफल हो भी पाएंगे या नही, लेकिन उन्होंने पूरी ताकत के साथ अपने काम को पूरा करने की कोशिश तो की. और उनके इन्ही कोशिशो के फलस्वरूप बाद में उनके स्वतंत्रता अभियान ने एक विशाल रूप ले लिया था. और वह अभियान अंत में भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाकर ही रुका।

आर्य समाज में प्रवेश करते ही लाला लाजपत राय एक नेता के रुप में प्रसिद्ध हो गये। आर्य समाज की विभिन्न गोष्ठियों और सभाओं का आयोजन इनके नेतृत्व में किया जाता था। इसी क्रम में इन्हें लाला साईंदास (आर्य समाज की लाहौर शाखा के प्रधान) ने राजपूताना और संयुक्त प्रान्त में जाने वाले शिष्टमंण्डलों में जाने के लिये चुना। उन शिष्ट मण्डलों में महत्वपूर्ण सदस्य के तौर पर मेरठ, अजमेर, फर्रुखाबाद आदि स्थानों पर भ्रमण किया, भाषण दिये, आर्य समाजियों से मुलाकात की और इस बात का अनुभव किया कि कैसे एक छोटी सी संस्था का विकास हो रहा है। आखिरकार इन्हें वो प्राप्त हो गया जिसकी खोज में उनका मन बचपन से भटक रहा था। उनकी जिज्ञासा का परिणाम यह हुआ कि उन्हें जो ठीक लगा उसमें उतर गये- उसका दोष दिखायी दिया तो उसे छोड़ दिया और जो सत्य लगा उसके पीछे दौड़ पड़े और अन्त में एक सच्चे जिज्ञासु बन गये।

लाजपत राय को इस समाज का जो आदर्श सबसे अधिक आकर्षित करता था वो था समाज के प्रत्येक सदस्य से यह आशा करना कि व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा समष्टि के कल्याण को श्रेष्ठ समझे। यही सेवा भाव इनके मन में आर्य समाज के प्रति श्रद्धा को प्रगाढ़ (मजबूत) कर देता था। इन्हें आर्य समाज के सिद्धान्तों ने आकर्षित नहीं किया था बल्कि आर्य समाज के द्वारा हिन्दुओं के कल्याण के लिये उत्साह, भारत के गौरवमयी अतीत उत्थान के लिये किये गये प्रयत्न और देश भक्ति के भावों ने आर्य समाज ने इनके मन में विशेष स्थान प्राप्त किया।

विचार:-
1.सार्वजनिक जीवन में अनुशासन को बनाये रखना और उसका पालन करना बहुत आवश्यक है, अन्यथा प्रगति के मार्ग में बाधा खड़ी हो जायेगी.
2.असफलता और पराजय कभी- कभी विजय की ओर आवश्यक कदम होते हैं.
3.दूसरों पर विश्वास न रखकर स्वयं पर विश्वास रखो. आप अपने ही प्रयत्नों से सफल हो सकते हैं, क्योंकि राष्ट्रों का निर्माण अपने ही बलबूते पर होता है.
4.जब तक कोई देशवासी पुलिस या सेना में सेवारत है, वह न तो शपथ भंग करे और न ही अपने कर्त्तव्य से विमुख हो. यदि उसे अपने अधिकारी के किसी आदेश से लगे कि यह धर्म और देश के प्रति घातक है तो बेहतर है कि वह अपने पद से त्यागपत्र दे दे.
5.त्रुटियों का संशोधन का नाम ही उन्नति है.
6.धर्म का अर्थ है – आत्म की ब्रह्म स्वरुपता को जान लेना, उसका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त कर लेना और तद्रूप हो जाना. यह धर्म कही बाहर से नहीं आता, बल्कि यक्ति के अभ्यंतर से ही उदित होता है. आध्यात्मिक और विश्वव्यापी धरातल पर आते ही धर्म यथार्थ हो उठता है, सजीव हो उठता है, जीवन का अंग बन जाता है. और धर्म तो वाही है जो इहलोक और परलोक में सुखभोग की प्रवृति दे. मनुष्य में जो स्वाभाविक बल है, उसकी अभिव्यक्ति ही तो धर्म है.

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