शाकम्भर मंदिर
11
May

शाकम्भरी के मंदिर में होती है सभी मनोकामना पूरी

पौराणिक दृष्टि

देश के मानचित्र में 27 अक्षांस उत्तर और 75 देशान्तर पूर्व में अवस्थित और जयपुर जिले के सांभर कस्बे में उतर पश्चिम से दक्षिण पूर्व तक फैली भारत की सबसे बड़ी नमक की झील का गौरव सांभर क्षेत्र को प्राप्त हैं। पौराणिक दृष्टि से सांभर का नाम शाकम्भरी से ही पड़ा हैं। सांभर में नमक की झील के एक ओर की वनस्थली में पहाड़ी पर स्थित क्षेत्र की अदिष्ठात्री देवी भगवती शाकम्भरी का मंदिर हैं। यह पूर्व मध्य युग से उपासना स्थलों में गिने जाने वाला महाशक्ति एवं जगमाता का सिद्धपीठ मंदिर हैं। क्षेत्र में शाकम्भरी के मंदिर का महत्व सर्वोपरि हैं।

शाकम्भरी के स्थान

देश में शाकम्भरी के तीन साधना पीठ हैं। पहला सहारनपुर में, दूसरा सीकर के पास और तीसरा सांभर में स्थित हैं। अनेक जातियों और उपजातियों द्वारा पूजी जाने वाली शाकम्भरी सबकी कुल देवी रही हैं। मंदिर के बाहर एक कुण्ड, कुछ पुराने मकानात, मंदिर क्षेत्र में छतरियां, चिलचिलती धुप और बरसती आग के बीच भी ऐसा लगता है जैसे इस आध्यात्मिक परिवेश में बड़ी शालीनता हैं, यहाँ आने वाले लोगो को सुख और अपरिमित आनंद की प्राप्ति होती हैं। झील के किनारे का यह मंदिर दूर से एक द्वीप जैसा लगता हैं। यहाँ आने वाले भक्तों को सांसारिक मोहमाया के बीच भी वो सब मिलता है जिसको सभी बाहर खोजते हैं जैसे- आध्यात्मिक सुख। जात-जडुलो और मनोतियों के बहाने सभी यहाँ आते हैं। भक्तों का क्या, जब मन हुआ शाकम्भरी के दर्शन करने आ जाते है और मनचाहा अनुभूत अपने साथ ले जाते। सांभर के आसपास गाँवो के अतिरिक्त राजस्थान के सभी जिलो के अलावा देश और विदेशों से भी भक्त माँ शाकम्भरी के दर्शन करके उनका आशीर्वाद लेने यहाँ आते हैं।

मध्युगीन सांभर

सांभर, नागौर आदि का चौहान शासित प्रदेश सवालख गाँवों की संख्या के अनुसार क्षेत्रों का नाम रखने की परंपरा चलती थी। सांभरिया के चौहान का मुलपुरुश वासुदेव चौहान 551 ई. के आसपास हुआ। सांभर (शाकंभरी) देश का प्रारंभिक शासक वासुदेव चवहान या चौहान थे। उजड़े हुए नालियासर के पास ही वासुदेव ने शाकंभर नाम से अपनी राजधानी स्थापित की।

सांभर झील की स्थापना

“श्री शाकम्भरी महामाया कथा” में इस क्षेत्र के चाँदी की खान बनने की किवंदती को काव्य रूप में दिया गया है “बारह कोस घोड़ा फिरा हुई चाँदी की खान, मुझे कोन खाने दे माता लड़सी आलम जहांन, तभी कर दिया नमक पानी।” पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माँ शाकम्भरी ने पृथ्वीराज चौहान को वरदान दिया कि वह बिना पीछे मुड़े जितनी दूर अपना घोड़ा दौड़ाएगा उतनी दूर चाँदी की खान बन जायेगी। पृथ्वीराज चौहान ने घोड़ा दौड़ाने के पश्चात् मन में विचार किया कि मुझे कौन ये चाँदी की खान रखने देगा, इसके पीछे पूरा जहांन लड़ेगा जिससे ना जाने कितने निर्दोशों की जान जाएगी। यह सोचते हुए पृथ्वीराज चौहान पीछे मुड़ गए और चाँदी की खान नमक की झील में तब्दील हो गई। इसलिए आज भी लोग इसे कच्ची चाँदी कहते हैं।

कैसे हुआ माँ शाकम्भरी का अवतार

कहते है शाकम्भरी पर्वत से प्रकट हुई और एक सन्नाटे के बीच जैसे ही उसने अपना मुख बाहर किया विजन की झाड़ियां झर्रा गयी, पर्वत से ध्वनि हुई और उसके प्रकट होने के साथ ही नरेश को पहले कंपकंपी सी हुई और फिर वह वरदान पाकर निडर हो गया। लेकिन अपनी छठा दिखलाने के साथ ही देवी पर्वतमय हो गई। यह देवी का चमत्कार ही था कि मुग़ल सल्तनत के जहाँगीर जैसे वीर भी उसके आगे शरणागत हो गए और उन्होंने मंदिर की पहाड़ियों पर एक छतरी का निर्माण करवाया। भक्तों के मन में आस्था और विश्वास है कि माँ शाकम्भरी उनकी सभी मनोकामनाये पूर्ण करती है और उनकी लाज रखती हैं। इसलिए भक्तों की जुबान पर यह पंक्तियाँ सदैव रहती शाकम्भरी “मातु शाकम्भर राजरानी, लाज मेरी राखो भवानी।”