Sachiya mata
04
Dec

सच्चियाय माता मंदिर, ओसियां जिसके गर्भगृह में है स्वयं माँ महिषमर्दिनी

श्री सच्चियाय माताजी का यह शक्ति पीठ भारत में सुविख्यात देवी उपासना का केन्द्र माना जाता है । जहाँ आधिदैविक एंव आधिभौतिक सम्पदाओ का समनिवत रूप युगो युगो से प्रत्यक्ष द्रष्टिगोचर होता रहता है ओसियां नगर की सांस्कृतिक परम्परा और इसकी ऐतिहासिकता इतनी प्राचीन है कि इसका उदभव और विकास जानना सामान्य जिज्ञासु भक्त के सामर्थ के बाहर की बात बन गर्इ है ।

यही कारण है कि इस शक्तिपीठ के साथ अनेका अनेक चमत्कार चुक्त किवंदितीया का गहरा सम्बन्ध जुड़ा हुआ है । पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर जिले से उतर पूर्व में 65 कि.मी. की दूरी पर रेगीस्तानी आँचल में ओसिया में गांव के बीचो बीच सच्चियाययय माताजी का सुविशाल मंदिर स्थित है ।

इस भव्य मंदिर का निर्माण परमार राजपूत राजाओं ने 1177 ईस्वी में करवाया था। मंदिर में स्थापित मां दुर्गा की मूर्ति महिषासुरमर्दिनी अवतार में है। मंदिर का स्थापत्य नागर शैली का है, जिसमें जाली का खूबसूरत काम किया गया है।

सच्चियाय माता (सचिया माता) की पूजा ओसवाल जैन, कुमावत, राजपूत, परमार, पंवार, चारण तथा पारीक समाज के लोग करते हैं। ओसियां में मिले एक शिलालेख के अनुसार जैन धर्म के एक आचार्य श्रीमद् विजय रत्नाप्रभासुरीजी ने ओसियां की यात्रा की थी। इनके अनुसार ओसियां का पूर्व का नाम उपकेशपुर था और यहां चामुण्डा माता का मंदिर था। इनका मानना था कि चामुण्डा माता का दूसरा नाम सच्चियाय माता ही था।

सच्चियाय माता के मंदिर में मिठाई, नारियल, कुमकुम, केसर, धूप, चंदन, लापसी इत्यादि का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। यह एक जन आस्था का केन्द्र है और इसे जोधपुर का सबसे बड़ा मंदिर माना जाता है।

मन्दिर में दर्शन का समय: प्रात: 5 बजे से लेकर रा​त 8 बजे तक।

कैसे पहुंचें  :

सड़क: जोधपुर से 64 किलोमीटर, जयपुर से 386 किलोमीटर।
रेल: ओसियां से 1.4 किलोमीटर।
एयरपोर्ट: जोधपुर से 64 किलोमीटर।

मंदिर कालांतर में यह जैन धर्म का केंद्र बना तथा यहां के महिषमर्दिनी मंदिर के पश्चात सच्चियाय माता का मंदिर निर्मित हुआ, जिसकी वजह से यह हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का पावन तीर्थ बना।

ओसिया में शक्ति मंदिर पीपला माता एवं सच्चियाय माता मंदिरों के नाम से जाने जाते हैं। सूर्य मंदिर के पास ही पीपला माता का मंदिर स्थित है, जिसके गर्भगृह में महिषमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है, जिसके दोनों ओर कुबेर एवं गणेश की प्रतिमाएं स्थित हैं। बाहर की ओर भी महिषमर्दिनी की प्रतिमा के अलावा गजलक्ष्मी एवं क्षमकरी की प्रतिमाएं स्थित हैं। इस मंदिर के सभामंडप में ३० अलंकृत स्तंभ हैं। पास ही की पहाड़ी पर १२ वीं शताब्दी में निर्मित सत्तिया माता अर्थात महिषमर्दिनी का देवालय है, जिसके मंडप में ८ तोरण अत्यंत आकर्षण एवं भव्यता की कलात्मकता लिए हैं। मंदिर पर लेटिन शिखर स्थित है तथा चारों ओर छोटे-छोटे वैष्णव मंदिर निर्मित हैं।

यहीं महिषमर्दिनी बाद में सच्चियाय माता के नाम से जन-जन में लोकप्रिय हुई, जिसकी वजह से ओसिया हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का तीर्थस्थल बन गया। पश्चिम मुखी इस मंदिर का विशाल सभामंडप ८ बड़े खम्भों पर टिका है, जिनकी कलात्मकता देखते ही बनती है। मंदिर के वि. सं. १२३४ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस स्थल की जंघा पर चंडिका, शीतला, सच्चियायय, क्षेमकरी एवं क्षेत्रपाल अंकित हैं।

भौतिक एवं लौकिक जीवन के उज्ज्वल पक्ष एवं शाश्वत और अविरल स्वरूप लिए सच्चियाय माता मंदिर के चारों ओर छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं। यहां के वैष्णव मंदिर ८ वीं शताब्दी के हैं, लेकिन सच्चियाय माता मंदिर के १० वीं शताब्दी में निर्मित होने के प्रमाण मिले हैं, जिसका १२ वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार किया गया। हालांकि मंदिर की संस्कृति के मूल तत्व में तो कोई भिन्नता नहीं है, लेकिन बाह्य स्वरूप में कुछ अंतर अवश्य देखा जा सकता है।

जैन धर्म के प्रचार एवं प्रभाव के पश्चात वैष्णव एवं शााक्त मंदिरों में उपेक्षा की स्थिति अवश्य उत्पन्न हुई और यह स्थिति कालांतर में बदतर होती ही गईं। यह बात सार्वभौमिक सत्य है कि मानव का समाज को योगदान उस संस्कृति के प्रभाव पर निर्भर करता है एवं संस्कृति द्वारा ही निर्धारित होता है। ऐसा ही यहां जैन दर्शन के प्रभाव के क्रम में दृष्टिगोचर होता है, कारण कि संस्कृति के इतिहास से ही मानव एवं क्षेत्र की प्रगति का इतिहास मिलता है।

ओसिया के मंदिर में सुंदर घट पल्लव, कीर्तिमुख, लहर वल्लरी तथा कलात्मक तोरण द्वारों की खूबसूरती लाजवाब एवं अद्वितीय है। हरिहर मंदिर संख्या एक के केंद्रीय मूल प्रासाद में मकर वाहिनी गंगा की प्रतिमा का अंकन अतीव भव्य एवं उत्कृष्ठ स्वरूप लिए है। इसमें गंगा को अपने वाहन मकर पर तृभागीय मुद्रा में हाथों में पूर्ण घट थामे प्रकट किया गया है तथा गंगा का परिधान तथा नाक, कान, गले एवं बाहों के आभूषणों का गतिमान अंकित कर कलात्मकता की ऊंचाइयों को प्रकट किया गया है। ऐसी सांस्कृतिक धरोहर ही मानव एवं समाज के मध्य एक प्रभावशाली एवं सफल समन्वय स्थापित करती हैं।

ओसिया के सच्चियायय माता मंदिर के तीसरे लघु मंदिर की उत्तरी दीवार में शिव तथा पार्वती की संयुक्त प्रतिमा पूर्णतया शास्त्रानुसार स्थित है। पार्वती के आधे मस्तिष्क जटामुकुट स्थित हैं। शिव के हाथ में त्रिशूल है एवं पार्वती के हाथ में दर्पण हैं। इस संयुक्त प्रतिमा के आधे वक्षस्थल पर स्तन एवं हार हैं। इस प्रतिमा के दर्शन से श्रद्धालुओं को आत्मिक एवं आध्यात्मिक सत्य का आभास सहज ही हो जाता है।

संयुक्त प्रतिमाओं के क्रम में ही ओसिया के ही हरि मंदिर में विष्णु एवं शिव की संयुक्त प्रतिमा को भी देखा जा सकता है, जिनमें दक्षिण में शिव एवं वामार्थ में विष्णु भगवान अनुटंकित हैं। वरदा मुद्रा धारण किए शिव के हाथों त्रिशूल है, वहीं विष्णु के हाथों में सुदर्शन चक्र एवं कमल हैं। दोनों देवों के वाहन नंदी और गरूड़ भी साथ में दिखाई दे रहे हैं। सच्चियाय माता मंदिर में ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सूर्य की एक संयुक्त प्रतिमा भी स्थित हैं, जिसके ८ हाथ हैं। प्रतिमा के दाहिनी ओर शिव का रूप हाथ में त्रिशूल एवं खडवांग लिए हैं, जबकि बायीं ओर का मुंह विष्णु भगवान का है, जिनके दोनों हाथों में शंख एवं चक्र हैं, जबकि ब्रह्मा के दोनों हाथों में कमल पुष्प हैं।

इस प्रकार की संयुक्त प्रतिमाएं हिन्दू धर्म के विभिन्न मतों की धार्मिक एकता एवं सहिष्णुता की प्रतीक हैं। ओसिया के प्राचीन एवं कलात्मक मंदिरों की धरोहरों एवं उनकी प्रेरणा के मद्देनजर अंत में यही कहा जा सकता है कि यहां सनातन हिन्दू जैन एवं बौद्ध धर्मों के परस्पर सामंजस्य युक्त सांस्कृतिक स्वरूप में सांप्रदायिक सौहार्द एवं सद्भाव का अनुपम संगम देखने को मिलता है। इससे इस अनुपम तीर्थस्थल पर जन आकांक्षाओं और विचारधाराओं का प्रादुर्भाव नित तीर्थयात्रियों में होकर तीर्थ को उफत करता रहता है।

जोधपुर से हर एक घण्टे बाद ओसिया पहुंचने के लिये बस सेवा उपलब्ध है ।