प्रभु का स्मरण
10
May

सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करेंगे तो प्रभु अवश्य सुनेंगे

अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के पास द्रौपदी गई उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोली,” पुत्री भविष्य में कभी तुम पर दुख,पीड़ा या घोर से घोर विपत्ति भी आए तो कभी अपने किसी नाते-रिश्तेदार की शरण में मत जाना। सीधे भगवान की शरण में जाना।”

उत्तरा हैरान होते हुए माता द्रौपदी को निहारते हुए बोली,”
आप ऐसा क्यों कह रही हैं माता?” द्रौपदी बोली,

” क्योंकि यह बात मेरे ऊपर भी बीत चुकी है।

जब मेरे पांचों पति कौरवों के साथ जुआ खेल रहे थे, तो अपना सर्वस्व हारने के बाद मुझे भी दांव पर लगाकर हार गए। फिर कौरव पुत्रों ने भरी सभा में मेरा बहुत अपमान किया।

मैंने सहायता के लिए अपने पतियों को पुकारा मगर वो सभी अपना सिर नीचे झुकाए बैठे थे। पितामह भीष्म, द्रोण धृतराष्ट्र सभी को मदद के लिए पुकारती रही मगर किसी ने भी मेरी तरफ नहीं देखा
वह सभी आंखे झुकाए आंसू बहाते रहे।”
फिर द्रौपदी ने भगवान से कहा,”आपके वाय मेरा कोई भी नहं है।

भगवान तुरंत आए और द्रौपदी की रक्षा करी।
जब द्रौपदी पर ऐसी विपत्ति आ रही थी तो द्वारिका में श्री कृष्ण बहुत विचलित होते हैं ।
क्योंकि उनकी सबसे प्रिय भक्त पर संकट आन पड़ा था।

रूकमणि उनसे दुखी होने का कारण पूछती हैं तो वह बताते हैं मेरी सबसे बड़ी भक्त को भरी सभा में नग्न किया जा रहा है।
रूकमणि बोलती हैं,”आप जाएं और उसकी मदद करें।”
श्री कृष्ण बोले,” जब तक द्रोपदी मुझे पुकारेगी नहीं मैं कैसे
जा सकता हूं।
एक बार वो मुझे पुकार लें तो मैं तुरंत उसके पास जाकर उसकी रक्षा करूंगा।

तुम्हें याद होगा जब पाण्डवों ने राजसूर्य यज्ञ करवाया तो शिशुपाल का वध करने के लिए” मैंने अपनी उंगली पर चक्र धारण किया तो उससे मेरी उंगली कट गई”।

उस समय “मेरी सभी 16 हजार 108 पत्नियां वहीं थी। कोई वैद्य को बुलाने भागी तो कोई औषधि लेने चली गई”!

मगर उस समय “मेरी इस भक्त ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उसे मेरी उंगली पर बांध दिया ।आज उसी का ऋण मुझे चुकाना है लेकिन जब तक वो मुझे पुकारेगी नहीं मैं नहीं जाऊंगा।”
अत: द्रौपदी ने जैसे ही भगवान कृष्ण को पुकारा प्रभु तुरंत ही दौड़े चले गये।

इस प्रसंग से अपन समझ सकते है के जब भी सच्चे मन से प्रभु स्मरण करेंगे तो प्रभु अवश्य सुनेंगे!!

Related Post