बाब हजर कमर अली
11
May

चमत्कारिक पत्थर : बाबा हजरत कमर अली दरवेश दरगाह

हिंदुस्तान सांझा संस्कृति की भूमि है यहां देवताओ के अवतार के हज़ारों किस्से है तो सूफी संतो और फकीरो के चमत्कारों की भी हज़ारों कहानिया है। ऐसी ही एक कहानी या यूँ कहूँ कि एक चमत्कार महाराष्ट्र के हजरत कमर अली दरवेश बाबा की दरगाह जो कि पुणे-बेंगलुरु हाईवे पर स्थित शिवपुर गांव में है वहाँ देखने को मिलता है। यहाँ पर आज से 700 वर्ष पूर्व सूफी संत हजरत कमर अली दरवेस को दफनाया गया था। हजरत कमर अली एक सूफी संत  थे जिनका निधन मात्र 18 साल की उम्र में हो गया था। उन्हें उनकी मृत्यु के पश्चात संत की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

इस देश में अनेकानेक सूफी संत ऐसे हुए है जिनके साथ कई चमत्कारिक किस्से जुड़े है। हिंदुस्तान के लोग आस्तिक होते है उनकी आस्था तब और ज्यादा मजबूत हो जाती है जब हजरत दरवेस आलम जैसे संतो के कारनामे इस कलयुग में भी अपना चमत्कार  दिखाते रहते है। पुणे से बेंगलुरु जाने वाले हाई वे पर मात्र 25 किलो मीटर दूर यह दरगाह अपने सीने में साम्प्रदायिक सौहार्द के साथ साथ सभी धर्मो के अनुयायियों के लिए अपार स्नेह  आस्था को संजोये हुए है यहां आने वालो में हर वर्ग,समाज और समुदाय के लोग होते है जो अपने सीने में मुरादों का सैलाब लिए आते है और अपनी मन्नतों को पूरा करने के लिए अकीदत के फूलों  का नजराना पेश कर ख़ुशी खुसी यहां से चले जाते है। 700 सालो से आस्था का केंद्र बने हजरत कमर अली दरवेस की दरगाह इन सब के साथ एक और ख़ास वजह से भी पूरी दुनिया में जानी जाती है यहां एक 90 किलो का गोल भारी भरकम पत्थर दरगाह के परिसर में रखा है कहा जाता है यह पत्थर हजरत कमर अली दरवेस के जमाने में भी यही हुवा करता था उनके जाने के बाद इसकी चमत्कारिक शक्तियों से लोगो को जब लाभ होने लगा तो इसकी प्रसिद्धि दूर दराज के इलाको सहित विदेशो तक भी फेल गयी।

कहा जाता है कि यहाँ आने वाले जायरीनों मेसे 11 लोग एक साथ अपनी तर्जनी ऊँगली इंडेक्स फिंगर से एक साथ हजरत कमर अली दरवेस का नाम जौर से पुकार कर उठाते है तो यह पत्थर उठ जाता है लेकिन इसी पत्थर को दरगाह के परिसर से बाहर उठाने की कोशिश करे तो यह नही उठता।

क्या वाकई यह पत्थर चमत्कारिक है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण छुपा है?  इसका सच जानने के लिए हमे नोवीं सदी के अध्याय से उस दुबले से शरीर और सूफियाना अंदाज़ वाले बच्चे के इतिहास पर नज़र डालनी होगी।

करीब 800 साल पहले एक मुस्लिम परिवार दारोदी गाँव में रहने को आया था बताया जाता है कि वो परिवार पश्चिम की तरफ से आया था जिसमे स्वयं हजरत क़मर अली दरवेस उनकी माँ और पिताजी भी साथ थे। जहां आज दरगाह बनी है वहां एक व्यायामशाला हुवा करती थी जिसमे दो बड़े बड़े पत्थर जिनमे एक 70 किलो और दूसरा 90 किलो का था उन पत्थरों को गाँव के पहलवान अपनी कलाइयां और भुजाओ को मजबूत करने के लिए उठाने की कोशिश किया  करते थे परन्तु वे नाकाम रहते थे।

हजरत क़मर अली दरवेस के माता पिता भी यह चाहते थे कि दरवेस भी पहलवानी करे लेकिन हजरत की सारीरिक दुर्बलता और नापसन्दीदा खेल के कारण वे पहलवानी नहीं कर पाए और इसी लिए उन्हें दूसरे पहलवान तरह तरह से ताना मार कर चिढ़ाया करते थे लेकिन मृद भाषी, संतोषी और आध्यतमक विचारो के धनी हजरत क़मर अली दरवेस पर इसका कोई असर नही पड़ता था वे बचपन से ही सूफियाना अंदाज़ में जिए उनका बर्ताव, आदते और बात चित का लहजा सबसे अलग और हट कर था। हज़रत दरवेस पहलवानो को उस पत्थर से संघर्ष करते देखा करते थे। एक दिन जब सारे पहलवान उन पत्थरों को उठाने का प्रयास कर रहे थे तब हज़रत दरवेस ने उनसे कहा कि इतना हल्का पत्थर भी आप मिलकर नही उठा सकते जबकि यह छोटा पत्थर मात्र 09 लोग अपनी तर्जनी ऊँगली से उठा सकते है पहलवानो को हज़रत दरवेस की बात अजीब लगी। हज़रत दरवेस ने दुबारा पुकारा कि यह बड़ा पत्थर मात्र 11 लोग अपनी तर्जनी उंगली से ही उठा सकते है और यकीन ना हो तो आप सब मेसे 11 लोग इसके चारों और अपनी तर्जनी ऊँगली को लगा कर जोर से मेरा नाम पुकारते हुए इसे हवा में उछाले लोगो को उनकी बात मज़ाक लगी फिर भी 11 पहलवानो ने हज़रत दरवेस के बताये अनुशार अपनी तर्जनी ऊँगली से पत्थर उठाने का निर्णय लिया और देखा कि हज़रत दरवेस के नाम के साथ तर्जनी उँगलियों का कमाल हवा में उछल रहा था बस यही से उस सूफी संत के पूजे जाने का अध्याय शुरू हो गया पहलवानो मेसे 09 ठीक उसी तरीके से छोटे पत्थर को भी उठाया और वो भी हवा में किसी कागज़ की तरह लहराता हुवा जमीन पर आ गिरा।

हज़रत दरवेस आज 700 सालो के बाद भी दुनिया के लिए आस्था का केंद्र है पूरी दुनिया से उन्हें मानने वाले और उनके  अजूबे को देखने के रोजाना भारी में शिवपुर पहुँच रहे है। आज दुनिया के बड़े बड़े वैज्ञानिक भी इस रहस्य को जानने के लिए शिवपुर आते है इस पत्थर के यूँ उठा लिए जाने के पीछे के वैज्ञानिक कारणों पर भी रिसर्च किया जा रहा है। धारणा यह भी रही है कि जब जब भी दरगाह को नुकशान पहुंचाने की कोशिश की गयी उनलोगों के साथ कुछ कुछ अशुभ होता गया धरना यह भी है कि कई बार इन पत्थरों को वहाँ से हटाने का भी प्रयास किया गया परन्तु अपनी अलौकिक और चमत्कारिक शक्तियों के कारण हज़रत दरवेस ने अपने आस्थाने से इन पत्थरों को बाहर नही लेजाने दिया।
हज़रत कमर अली दरवेस कोई साधारण व्यक्ति नही थे मात्र 18 सालो की उम्र में ही उन्होंने लोगो को अहसास करवा दिया था कि वे असाधारण व्यक्तित्व है उनके ज्ञान,सोच और आध्यत्म ने उन्हें सूफी की उपाधी से नवाज़ा। सूफी शुद्ध ग्रीक शब्द सोफिया से निकाला है जिसका अर्थ होता है ज्ञानी। आध्यत्मिक व्यक्ति सूफी वाद में रहकर इस्लाम के परम् और सच्चे भक्त बने रहते है हज़रत कमर ने भी अपनी छोटी सी जिंदगी इस्लाम के गूढ़ दर्शन और सिद्धान्तों के साथ जीवन जीया। शिवापुर की इस दरगाह के ठीक निचे घाटी की तलहटी में एक और चमत्कारिक घटना घटती है यहाँ एक चट्टान से लगातार शुद्ध जल का प्रवाह आज भी जारी है कोई नही जानता कि आखिर इस पानी का स्रोत क्या है आखिर कहाँ से आता है यह पानी? लोग इसे चमत्कारिक पानी समझ कर इसे पीते है इससे स्नान करते है लोगो की यह  धारणा है इससे नहाने से इन्शान रोग मुक्त हो जता है यहां आने वाले जायरीन इस पानी को पीना और इससे नहाना नही भूलते। विज्ञान आज यह तलास करने में जुटा है कि क्या हज़रत कमर अली दरवेस सैंकड़ों साल पहले विज्ञान के सिद्धान्तों से वाकिफ थे या फिर उन्हें विज्ञान का ज्ञान था। बहार हाल  हो आज भी दरगाह हज़रत कमर अली दरवेस शिवापुर पूना जाने वालो की आस्था का अंदाजा से लगाया जा सकता है कि 11 –11 जायरीन मिल कर बार बार उस पत्थर को अपनी तर्जनी उंगली से उठाते है और कमाल देखिये कि वो पत्थर उठ भी जाता है।

सच यह भी है कि सूफी वाद एक आध्यात्मिक सम्प्रदाय है जो इस्लाम को मानता है सूफीवाद के अनुयायी आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशरण करते है, यहां शुद्ध इस्लाम के गूढ़ दर्शन और सिद्धान्तों  गले लगाया जाता है सूफी वाद में सूफी की उपाधि मिलने का मतलब है व्यक्ति प्रकृति के अंदरूनी कामकाज और रूहानी ताकतों को प्राप्त कर गया है। और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज सूफी संतों की मज़ारो, दरगाहो पर प्रति दिन मेले लगे रहते है। लोग उनके सिद्धान्तों को अपनाते है उनकी चमत्कारिक शक्तियों को देख कर, समझ कर उनका अनुशरण करने की कोशिश करते है।