राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी
26
Dec

महान क्रांतिकारी राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी

बंगाल (आज का बांग्लादेश) में पबना जिले के अन्तर्गत मड़याँ (मोहनपुर) गाँव में 23 जून, 1901 के दिन माता बसन्त कुमारी  और पिता क्षिति मोहन लाहिड़ी के घर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (Rajendranath Lahiri) का जन्म हुआ। उनके जन्म के समय पिता क्रान्तिकारी क्षिति मोहन लाहिड़ी व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे। दिल में राष्ट्र-प्रेम की चिन्गारी लेकर मात्र नौ वर्ष की आयु में ही वे बंगाल से अपने मामा के घर वाराणसी पहुँचे। वाराणसी में ही उनकी शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई। काकोरी काण्ड के दौरान लाहिड़ी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में एम० ए० (प्रथम वर्ष) के छात्र थे। 17 दिसम्बर, 1927  को गोण्डा के जिला कारागार में अपने साथियों से दो दिन पहले उन्हें फाँसी दे दी गयी। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को देश-प्रेम और निर्भीकता की भावना विरासत में मिली थी। जब  राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी (Rajendranath Lahiri) जी ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ से इतिहास से एम. ए. कर रहे रहे थे तब उनकी मुलाकात बंगाल के क्रांतिकारी ‘युगांतर‘ दल के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल जी से हुयी। राजेन्द्र की फौलादी दृढ़ता, देश-प्रेम और आजादी के प्रति दीवानगी के गुणों को पहचान कर शचीन दा (शचीन्द्रनाथ सान्याल) ने उन्हें अपने साथ रखकर बनारस से निकलने वाली पत्रिका बंग वाणी के सम्पादन का दायित्व तो दिया ही, अनुशीलन समिति की वाराणसी शाखा के सशस्त्र विभाग का प्रभार भी सौंप दिया। उनकी कार्य कुशलता को देखते हुए उन्हें हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन की गुप्त बैठकों में आमन्त्रित भी किया जाने लगा। लाहिड़ी की फौलादी दृढ़ता, देशप्रेम, तथा निश्चय की अडिगता को पहचान कर उन्हें क्रांतिकारियों ने अपनी अग्रिम टोली में भर्ती कर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशन आर्मी पार्टी’ का बनारस का प्रभारी बना दिया। वह बलिदानी जत्थों की गुप्त बैठकों में बुलाये जाने लगे।

उस समय क्रान्तिकारियों के चल रहे आन्दोलन को गति देने के लिए तत्काल धन की आवश्यकता थी। इसके लिए अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई। योजना के अनुसार 9 अगस्त, 1925 को सायंकाल छह बजे लखनऊ के पास काकोरी से छूटी आठ डाउन गाड़ी में जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया गया। काम पूरा कर सब तितर-बितर हो गये।

इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, ठाकुर रोशन सिंह सहित 19 अन्य क्रान्तिकारियों ने भाग लिया था। पकड़े गये सभी क्रांतिवीरों पर शासन के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने एवं खजाना लूटने का अभियोग लगाया गया।

इस कांड में लखनऊ की विशेष अदालत ने 6अप्रैल 1927 को निर्णय सुनाया, जिसके अन्तर्गत राजेन्द्र लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह तथा अशफाक उल्लाह को मृत्यु दंड दिया गया। शेष तीनों को 19 दिसम्बर को फाँसी दी गयी, लेकिन भयवश अंग्रेजी शासन ने राजेन्द्र लाहिड़ी को गोंडा कारागार में 17 दिसम्बर, 1927 को ही फाँसी दे दी।

काकोरी काण्ड

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी बलिदानी जत्थों की गुप्त बैठकों में बुलाये जाने लगे थे। क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आज़ादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के मद्देनजर शाहजहाँपुर में एक गुप्त बैठक हुई। बैठक के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेज़ी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी। इस योजनानुसार दल के ही प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी ‘आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन’ को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, चन्द्रशेखर आज़ाद व छ: अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया गया।

सज़ा

 बाद में अंग्रेज़ी हुकूमत ने उनकी पार्टी ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन’ के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया, जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु दण्ड (फाँसी की सज़ा) सुनायी गयी। इस मुकदमें में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम चार वर्ष की सज़ा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था। ‘काकोरी काण्ड में लखनऊ की विशेष अदालत ने 6 अप्रैल, 1927 को जलियांवाला बाग़ दिवस पर रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह तथा अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को एक साथ फांसी देने का निर्णय लेते हुए सज़ा सुनाई।

सूबेदार से झड़प

मृत्यु दण्ड की सजा मिलने के बाद भी राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी हमेशा की तरह अपना सारा समय व्यतीत करते थे. उनकी दिनचर्या में कोई भी बदलाव नहीं आया. इसे देख वहा के जेलर से उनसे सवाल किया कि
पूजा-पाठ तो ठीक हैं लेकिन ये कसरत क्यों करते हो अब तो फांसी लगने वाली हैं तो ये क्यों कर रहे हो ?
तब जेलर को जवाब देते हुए  राजेन्द्रनाथ जी ने कहा………
अपने स्वास्थ के लिए कसरत करना मेरा रोज़ का नियम हैं और मैं मौत के डर से अपना नियम क्यों छोड़ दू ?
यह कसरत अब मैं इसलिए करता हूँ कि……
मुझे दूसरे जन्म में विश्वास हैं. और मुझे दुसरे जन्म में बलिष्ठ शरीर मिले इसलिए करता हूँ, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य को मिट्टी में मिला सकू…

मौत

फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष भारत के तमाम राजनैतिक नेताओं द्वारा अत्यधिक दबाव और कई अपीलों के कारण अंग्रेजी सरकार डर गयी थी। इस कारण आज़ादी के दीवाने Rajendra Nath Lahiri जी को गोण्डा कारागार भेजकर अन्य क्रांतिकारियों से दो दिन पहले ही 17 दिसम्बर, 1927 को  इन्हें फाँसी दे दी।

शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जी फांसी के फंदे को चुमते हुए सिंह की गर्जना के साथ ‘वन्देमातरम‘ का  जयघोष किया। और बोले …
 मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि स्वतंत्र भारत में पुर्नजन्म लेने जा रहा हूँ।
और इसी के साथ उन्होंने फांसी के फंदे को गले में डालकर हंसते हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। और शहीद हो गए।

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